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 बस्तर दशहरा विशेष – कांटों के झूले में झूलकर काछन देवी ने दी दशहरा मनाने की अनुमति 

बी महेश राव @जगदलपुर। विश्व प्रसिद्व बस्तर  दशहरा पर्व मानाने की अनुमति काछन देवी ने बस्तर महाराजा को दे दी है। बुधवार को हुई इस अनुष्ठान मे राजा को  दशहरा बनाने की अनुमति देने की साक्षी हजारों लोग बने- दरअसल बस्तर  दशहरा पर्व मनाने के पहले बस्तर राजपरिवार को  काछन देवी की अनुमति लेन आवश्यक होता है

नाबालिक बालिका को काछन देवी की सवारी आती ह जिसे पूर्जा अर्चाना कर बस्तर राजा पर्व मानने की अनुमति लेते है काछन देवी  काटों की झुलें मे झुलते हुए राजा को अनुमति देती है।

बस्तर  दशहरा को सफलता पूर्वक संपन्न करवाने के लिए बस्तर राजपरिवार के सदस्य लाव-लष्कर के साथ स्थानीय राजमहल से सर्वप्रथम मावली माता के मदिर के सामने पहुंचते हैं, जहां माता की पूजा अर्चना के पष्चात पूरा समूह काछन गुड़ी पहुंचता है जहां बाकी रस्म अदा की जाती है ।

दरसल बस्तर  दशहरा जातीय समंभाव का प्रमुख पर्व है । इसमें सभी जाति के लोगों को जोडकर उनकी सहभागिता निष्चित की गई थी, इसलिए यह जनजन का पर्व कहलाता है । इस महापर्व की शुरूवात जातीय व्यवस्था के निचले पायदान पर खड़ी अनूसूचित जनजाति की बालिका की अनुमति से होता है ।

यह राष्ट्रीय एकता की भावना और नारी सम्मान का बेहतरीन उदहारण है । काछन जात्रा के पश्चात स्थानीय गोल बाजार में रैलादेवी की पूजा होती है । रैला देवी बस्तर राज परिवार की बेटी थी जिसे मुगलों ने अपहरित कर कुछ समय बाद छोड़ दिया था ।

राजवंश की प्रतिष्ठा के लिए सती होने से पहले रैला देवी ने राज्य के प्रमुख पर्व में अपनी पूजा का वचन लिया था । सदियों से यह परंपरा चली आ रही है । रूढ़ीवादी व्यवस्था में भी दलितो का समादर  दशहरा पर्व की विषेषता है ।

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