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जानिए कौन थे बस्तर के महाराजा, जिन्हें आज भी याद किया जाता है बस्तर दशहरा उत्सव में

  • 1965 तक रथ में आरूढ़ होता रहा राजपरिवार

जगदलपुर। बस्तर के ऐतिहासिक दशहरा पर्व को भव्य रूप प्रदान करने में बस्तर के भूतपूर्व महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव अपने जीवन के अंतिम क्षण तक आदिवासियों के इस परंपरागत पर्व को विधान के अनुसार संपन्न करवाते रहे, उनके जीवन काल में राजमहल के सिंह द्वार हमेशा आदिवासियों के लिए खुले रहे। देवी की रथ यात्रा, विधानों के अनुसार पर्व संपन्न करवाना उनके दृढ़ संकल्प एवं आदर्श के रूप में आज भी याद किया जाता है। यही कारण है कि बस्तर दशहरा की चर्चा शुरू होने के साथ प्रतिवर्ष बस्तर की आदिवासी जनता स्व. श्री प्रवीर चंद्र को अपना श्रद्घा सुमन अर्पित करने बस्तर के राजमहल पहुंचती है।

बस्तर का दशहरा यहां का एक उत्सव का केन्द्र होता है और बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी को सरकार के साथ इस धार्मिक उत्सव में सम्मिलित किया जाता रहा है। इस वर्ष भी नई चुनी दशहरा समिति उसी परंपरा को निभाएगी। 75 दिनों तक चलने वाले विश्व विख्यात बस्तर दशहरे उत्सव का आरंभ काछन गादी के नाम के उत्सव से प्रारंभ होता है। अश्विन वदी अमावस्या के दिन दोपहर को ग्रामों के मुखिया, मांझी, नगर के गणमान्य नागरिक तथा राजपरिवार के सदस्य नगाड़े ढोल और शहनाई, एवं वाद्य यंत्र के बीच होते हैं और बस्तर के ग्रामीण अंचलों से आये देवी देवताओं का यहां धूप दीप से स्वागत किया जाता है।

नगर के भंगाराम चौक के पास स्थित काछन देवी के मंदिर में जाकर इस देवी से दशहरा मनाने के अनुमति और सफलता पूर्वक दशहरा संपन्न होने का अभय दान राजपरिवार द्वारा वर्षों से मांगा जाता है। आज भी राजपरिवार के लोग देवी से अभय दान एवं आर्शिवाद लेकर उत्सव प्रारंभ करते हैं। इसी दशहरा पर्व के बीच नवरात्रि पर्व पर बस्तर की अराध्य देवी मां दंतेश्वरी मंदिर में कलश स्थापना होती है तथा सिरासार में जोगी बैठाई की रस्म की जाती है।

लगभग दो शताब्दी से जोगी एक आदिवासी परिवार का सदस्य इस रस्म को संपन्न कराते आ रहे हैं। यह माना जाता है कि इस जोगी बैठाई रस्म से दशहरा उत्सव में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व स्वयं हो जाता है। इस ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के अवसर पर जोगी बैठाई के दूसरे दिन फूल रथ का चलना प्रारंभ होता है। सिरासार भवन के पास से मावली गुड़ी देवी की पूजा यह रथ आदिवासी जनता के जुलूस के साथ निकलता है। रथ की भव्यता को देखने दूर-दूर से पर्यटक बस्तर आते हैं।

पूर्व में दंतेश्वरी मांई के छत्र के साथ महाराजा या राजपुरूष बैठते थे। सन 1949 से 1961 तक शासन के आदेश अनुसार फूल रथ पर दंतेश्वरी माई का छत्र ही रखकर रथ यात्रा संपन्न की जाती रही, 1961 में स्व. प्रवीर चंद्र भंजदेव की राजमान्यता समाप्त करने के बाद भी 1965 तक रथ पर राजपुरूष आरूढ़ होते रहे। 1966 में प्रवीर चंद्र भंजदेव की मृत्यु के बाद रथ पर दंतेश्वरी माई का छत्र ही लगातार रखकर रथ यात्रा संपन्न होती रही। किन्तु 1966 में स्व. महाराजा की विधवा महारानी वेदवती को शासन द्वारा रथ मे बैठनी की अनुमति दी गई थी। उस वर्ष महारानी ने दशहरा पर्व पर किसी प्रकार का शासकीय अनुदान लेने से इनकार कर दिया था।

वर्तमान में अनेक वर्षों से बस्तर की अराध्य देवी मां दंतेश्वरी का छत्र ही रथ पर बैठाया जाता है। 75 दिनों तक चलने वाले इस ऐतिहासिक बस्तर दशहरा के आकर्षक भीतर रैनी और विजयादशमी तथा बाहर रैनी एकादशी होती है, जिसमें आदिवासी एवं वन्यांचल वासी भारी संख्या में इस उत्सव में सम्मिलित होते हैं।

इस पर्व की समाप्ति बाहर रैनी के दूसरे दिन मुरिया दरबार के साथ संपन्न हेाती है। पुराने समय में इस दरबार में आदिवासी जनता अपनी भेंट महाराजा को अर्पीत करते थे और महाराजा सबकी शिकायतें सुनकर उसका निराकरण करते थे। वर्तमान में शासन द्वारा इस उत्सव के अंतिम दिन इस दरबार प्रथा को संपन्न कराया जाता है। जिसमें दशहरा समिति के पदाधिकारी और प्रशासनिक अधिकारी आदिवासी जनता की शिकायतें को सुनकर उनकी निवारण की व्यवस्था करते हैं। इस दरबार उत्सव के बाद काछन यात्रा तथा दूसरे दिन गंगामुंडा यात्रा और अंत में देवियों की विदाई का उत्सव होता है। उसी दिन दंतेवाड़ा से आई मां दंतेश्वरी की विदाई समारोह पूर्वक की जाती है।

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