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PCC चीफ भूपेश बघेल के परिवार को बड़ा झटका, हार गए जमीन की कनूनी लड़ाई, पूरी रिपोर्ट देखिये

प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिवार पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आरोप सच साबित हुआ

दुर्ग (अरविंद सिंह) :  प्रदेश कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष भूपेश बघेल के परिवार पर सरकारी जमीन पर कब्जा करने का आरोप सच साबित हुआ। प्रकरण पर न्यायाधीश स्मिता रत्नावत ने मंगलवार को फैसला सुनाया। न्यायाधीश ने पीसीसी अध्यक्ष के पिता नंदकुमार बघेल के उस परिवाद को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने २० एकड़ सरकारी जमीन को पैतृक संपत्ति बताया था।

बता दें कि इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ में सत्तापक्ष भाजपा और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस सहित जनता कांग्रेस जोगी के बीच राजनीति गरमाई थी। एक ओर जहां भूपेश ने भरी बरसात में उनकी नापवाने का आरोप लगाया था वहीं जोगी कांग्रेस के नेता विधान मिश्रा, आरके राय ने दुर्ग में प्रेस कांफ्रेंस लेकर मामले को तूल दिया था।

ग्राम कुरुदडीह में पटवारी हल्का नंबर 64 के मालगुजार

प्रकरण के मुताबिक नंदकुमार बघेल ने परिवाद में जानकारी दी थी कि उसके पिता स्व. खोमनाथ बघेल ग्राम कुरुदडीह में पटवारी हल्का नंबर ६४ के मालगुजार थे। १९७३ में उनके निधन के बाद भी २० एकड़ भूमि का उपयोग वे करते आ रहे है। चकबंदी के दौरान हुई गड़बड़ी के कारण रिकार्ड से उनका नाम गायब हो गया। वर्तमान में उक्त जमीन उनके कब्जे में है और उसका उपयोग वे कर रहे हैं। इसलिए रिकार्ड को सुधार कर जमीन को उनके नाम पर करने की अनुमति दी जाए।

परिवाद का आधार

परविादी नंदकुमार का कहना था कि खसरा नंबर ८३ का टुकड़ा ८.२०२ हेक्टेयर (२० एकड़) भूमि वर्तमान में शासकीय भूमि के रुप में दर्ज है। मालगुजार उन्मूलन के पहले कास्तकारी होती थी। वर्ष१९६९ में चंकबंदी होने के पूर्व खसरा नंबर ८३ विभिन्न खसरा नंबर ३७,३८,४०,४१,४२,४३,४४,४५,४६ व ५१-६ खसरा नंबर ८३ में बंटा हुआ था। चकबंदी के बाद उक्त सभी खसरा नंबर की भूमि खसरा नंबर ८३ में समाहित हुआ है। यह विवरण फेहरिस्त में उल्लेखित है। इसके बाद भी राजस्व अधिकारी रिकार्ड दुरुस्त नहीं कर रहे हैं।

न्यायालय का फैसला

न्यायाधीश ने फैसले में कहा है कि परिवादी वाद प्रमाणित करने में पूर्णरुप से असफल रहे। अत: संस्थित व्यवहार वाद में निम्न लिखित डिक्री पारित की जाती है।
0- वादी का वाद निरस्त किया जाए।
0- उभयपक्ष अपना अपना वाद व्यय स्वयं वहन करेंगे।
0-अधिवक्ता शुल्क नियमानुसार देय हो।

38 साल चला मुकदमा

नंदकुमार ने वर्ष१९८० में सरकारी जमीन को अपने नाम करने के लिए न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया। प्रकरण ३८ साल से न्यायालय में विचाराधीन था। खास बात यह है कि इस प्रकरण में परिवादी ने साक्ष्य परीक्षण कराया था, लेकिन प्रतिवादी ने प्रावधानों के अनरुप निर्धारित समय पर साक्ष्य परीक्षण नहीं करवाए जाने पर १९ मार्च१९९७ को प्रतिवादी साक्ष्य का अवसर समाप्त कर दिया था।

जाने प्रवधान को 

1947- आजादी के पहले कृषि योग्य व अन्य भूमि मालगुजार के नाम रहती थी।
1950- मालगुजारी का उन्मूलन हुआ। कृषि योग्य भूमि (कब्जा) को उनके नाम पर किया गया अन्य भूमि को शासन अपने अधीन ले ली।
1955-अधिकार अभिलेख तैयार किया। दस्तावेज में नाम चढ़ाया गया।
1959-भू-राजस्व तैयार किया गया। जमीन को खसरा नंबर पर विभाजन किया गया।

इस मामले में जमकर हुई राजनीति

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल के पैतृक और सरकारी जमीन पर कब्जे को लेकर राजनीति हुई। जिला मुख्यालय से लेकर राजधानी में जोगी कांग्रेस ने पत्रकार वार्ता भी ली थी। ६ जनवरी २०१७ को विधान मिश्रा ने कलक्टर आर शंगीता को जमीन से संबंधित कई अहम दस्तावेज सौंपकर खुलासा किया था कि कुरुदडीह की सरकारी जमीन पर भूपेश बघेल के पिता ने कब्जा कर रखा है। इस मामले में राज्य शासन ने जांच का भी आदेश दिया था। तीन सदस्यी टीम का गठन किया गया था। जांच टीम ने बघेल और उनके परिजनों के कुरूदडीह, बेलौदी और भिलाई तीन में जमीन की नापजोख भी की थी।

प्रशासन ने शासन को भेजी थी रिपोर्ट 

सरकारी जमीन पर कब्जे के मामले में टीम ने तब तीन दिनों तक जांच की थी। कुरूदडीह स्थित जमीन की नाप जोख के बाद सभी पुराने रिकार्ड से मौजूदा स्थिति का मिलान किया था। इसके बाद रिपोर्ट शासन को भेजी गई थी।

जमीन की कीमत करोड़ो में 

विवादित भूमि शहर से लगा हुआ है। जानकारी की मुताबिक जमीन की कीमत करोड़ों में है। जमीन पर कब्जे को लेकर ग्रामीणों ने भी आपत्ति की थी। मामला २०१७ में सार्वजनिक हुआ।

दस्तावेज में घास जमीन उल्लेखित

अतिरिक्त लोक अभियोजक नागेश्वर यदु ने बताया कि इस प्रकरण में परिवादी नंदकुमार बघेल ने ऐसा एक भी परिवाद प्रस्तुत नहीं कर पाया जिससे यह सिद्ध हो कि वास्तव में जमीन उनके नाम की है। दस्तावेजों में आरंभ से घास जमीन उल्लेखित है। इसे प्रमुखता से न्यायालय में रखा और न्यायालय ने सही ठहराकर परिवाद को खारिज किया।

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