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Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ी कलाकार आसाराम निषाद रोजी मंजूरी को मजबूर

पाटन:  छत्तीसगढ़ आज अपनी 17 वी सालगिरह मना रहा है और जगह जगह छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति को बढ़ावा देने और उसे बचाने जगह जगह पर हर संभव प्रयास और विभिन्न आयोजन किये जा रहे है परंतु आज से  50 साल पहले छत्तीसगढ़ी लोकगीतों के माध्यम से लोगों के जेहन में छत्तीसगढ़ी संस्कृति की बीज बोने वाले गायक आशाराम निषाद आज गुमनामी की जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

गुंडरदेही ब्लॉक के परसाहीटी में जन्मे आशाराम निषाद आज 65 वर्ष के हो चुके हैं और गाव में ही रोजी मजूरी कर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

जीवन भर गाव गाव में रामायण महाभारत और भजन गाकर अपना गुजारा किया उम्र के साथ बीमारी के चलते 2015 में गायन भी छूट गया और गरीबी का आलम ये है कि इस समय उनके पास उनका पसंदीदा वाद्ययंत्र खंजीरा बनाने या खरीदने तक के पैसे नहीं है।लंबे समय से शासन प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे है पर अब तक उनकी सुध किसी ने नही ली।

आकाशवाणी में गाये चार गाने….

आशाराम बचपन से ही संगीत के प्रति रुचि रखते थे और 12 साल की उम्र में अपने चाचा झल्लू राम के साथ खंजीरा बजाते हुए रागी का काम किया करते थे। आशाराम निषाद ने  1964 में अपने चाचा झल्लू राम के साथ आकाशवाणी में चार गाने गाए। जिसमे प्रमुख सुवागीत “तरी हरि नाना पहिरे हरा रंग साड़ी, लोटा वाली दुनो बहिनी” है और “चांद सुरुज तोर बैला भैसा,ब्रम्हा बिजहा धान गा। देवता मन हे तोर रौंजिया ,ते हस मोटहा किसान गा” जैसे किसानों के लिए गौरव बोध बढ़ाने वाले सु दर पंक्तिया आज तक सुनने को नही मिली। सिर्फ खंजेरी के साथ गाये गए इस गीत की काव्यात्मकता और दैवीय तुलनाओं ने उस समय जनमानस को झकझोर कर रख दिया और 1070 तक लगातार रेडियो  में बजते रहे,आज भी याद कदा ये गीत रेडियो में सुनने को मिले तो ऐसा लगता है कि ये पंक्तियां छत्तीसगढ़ महतारी की अंतरात्मा की आवाज है।

पाटन अंचल अनेक प्रतिभाशाली कलाकारों की जननी रही है पद्मश्री तीजनबाई और पद्मश्री ममता चंद्रकार ने छत्तीसगढ़ी लोककलाओं को एक अलग मुकाम तक पहुंचाया। पर वही पाटन की सीमा से लगे छोटे से ग्राम के आशाराम निषाद का नाम आज छत्तीसगढ़ के कलाकारों में ही नही आता और न ही उन्हें कोई शासकीय सुविधा और नही पेंशन मिलती है,सम्मान के नाम पर एक प्रतीक चिन्ह है जो उन्हें बालोद कपिलेश्वर महोत्सव में 2016 में उन्हें मिला था।

सबसे खास और उल्लेखनीय तथ्य ये है कि सुवागीत की  शैली जो आज सबसे ज्यादा प्रचलित है को सही आकार और धुन में पिरोने का श्रेय भी आशाराम को जाता है।उनकी इसी शैली का अनुसरण करके आज कई कलाकार चर्चित सम्मानित और पुरुस्कृत हो रहे हैं वहीं   विगत दिनों सुवा गीत पर एक अभिनव प्रयोग भी दुर्ग में हुआ और रिकार्ड भी बना पर आज तक आशाराम का नाम तक नही लिया गया।

पेंशन के नाम पर ठगी का शिकार हुए….

आशाराम निषाद ने हामरे संवाददाता को बताया कि पेंशन और अन्य सरकारी लाभ के लिए हर सरकारी दफ्तर और नेताओं के चक्कर लगा चुके हैं। यहाँ तक कि कुछ लोग उन्हें कलाकार के रूप में पेंशन दिलाने के नाम पर पैसे भी ऐंठ चुके हैं लेकिन आज तक न ही उन्हें पेंशन मिली और न ही शासन ने उन्हें कलाकार माना।

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