Chhattisgarh kanker

ऋण माफी किसानों पर कोई अहसान नहीं है : डॉ त्रिपाठी

कांकेर: किसान आंदोलन पर देश के शीर्ष किसान संगठनों की दिल्ली में महाचौपाल, आगामी चुनावों में किसानों के संगठन निभाएंगे अहम निर्भूणायक भूमिका,

चर्चा के प्रमुख बिंदु
सभी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तर्कसंगत विधि से लागत से डेढ़ गुना कैसे निर्धारित किए जाएं तथा सरकारी नीतियों तथा लगातार उपेक्षा के कारण कजऱ् के कुचक्र में फँसे किसानों को कैसे राहत मिले? महाराष्ट्र तथा मध्य प्रदेश में दलहन की गिरी क़ीमतों से किसानों को भारी घाटा ,दक्षिण के प्रदेशों में मिर्ची हल्दी तथा मसाला फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य न होने के कारण हानि, उत्तर भारत में गन्ना किसानों की समस्या ,छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में सब्ज़ी उत्पादककिसानों की गहन समस्या। फ़सल बीमा में विसंगतियां तथा देशी-विदेशी बीमा कम्पनियों द्वारा किसानों के नाम पर भारी लूट ।

केन्द्र ने भूमि अधिग्रहण विधेयक की असफलता के बाद राज्य सरकारों को निरंकुश तथा बलात भूमि अधिग्रहण हेतु खुली छूट दी । दूध तथा दूध के उत्पादों की खऱीदी तथा मूल्य लागत आधारित में होने से डेयरी उद्यमी किसानों की समस्या ।

सरकार से सहयोग चर्चा समन्वय तथा ज़रूरी पढऩे पर किसान आन्दोलनों हेतु समन्वित साझा नीति का शीघ्र अतिशीघ्र निर्धारण । अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक डॉ राजाराम ने कहा कि किसानों के संकट की जब बात आती है तो किसी भी दल की सरकार हो उसे सहज उपाय ,ऋण माफ करना लगता है. वास्तव में किसानों को ऋण की जरुरत ही नहीं पड़ती अगर सरकारें किसानों की हितों को ध्यान में रख कर नीतिगत फैसले लेती या फिर किसानोन्मुख नीतियां बनाती. डॉ त्रिपाठी नई दिल्ली में पच्चीस प्रमुख किसान संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि एक जून से दस जून तक किसानों ने ‘गांव बंदÓ आंन्दोलन के तहत हड़ताल किया है. डॉ त्रिपाठी ने कहा कि सभी किसान संगठन मिनिमम प्वाइंट एक्शन पर सहमत हुए है और किसानों न को युक्तियुक्त अर्थात तर्कसंगत कृषि उत्पादों का न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की मांग की. किसनों का कहना था कि अगर केंद्र में सत्तासीन भाजपा सरकार अगर अपने वादे को पूरा करती तो आज किसानों की स्थिति में सुधार नजर आता. सरकार वादा किया था कि वह किसानों की सकल लागत का डेढ़ गुना दिलाएगी लेकिन बीते चार वर्षों में सरकार ने अपना वादा पूरा नहीं किया. किसान संगठनों का कहना था कि किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना वास्तव में मिलने लगे तो उन्हें ऋण कि जरुरत ही नहीं पड़ेगी. लेकिन किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए सरकार को किसानोंन्मुख नीतियां बनानी होगी. बैठक में उपस्थित सभी किसान संगठन ने किसानों के राष्ट्रीय एजेंडा को लागू करने और क्रियान्वित करने के प्रारूप को अंतिम रूप दिया. उपस्थित संगठनों में प्रमुख भारतीय किसान संघ, राष्ट्रीय किसान संगठन, किसान सुरक्षा दल, अखिल भारतीय किसान सभा, अखिल भारतीय सब्जी उत्पादक संघ, अखिल भारतीय डेयरी फेडरेशन, तेलंगाना किसान समिति, दक्षिण एशिया बोरलाग एसोसिएशन, स्वराज अभियान, बिहार किसान समिति, और ऑल इंडिया हर्बल एसोसिएशन शामिल थे. अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) ने अन्य सभी किसान संगठनों के साथ समन्वय करने का फैसला किया ताकि साझा एजेंडे को बल दिया जा सके और सभी संगठनों को एक मंच पर लाया जा सके. इंडियन काउंसिल आफ फूड एंड एग्रीकल्चर (आईसीएफए) के अध्यक्ष डॉ एमजे खान ने कहा कि किसान संगठनों को सरकार के साथ-साथ सभी राजनीतिक दलों के साथ अर्थपूर्ण रूप से संलग्न होने की आवश्यकता है. उन्होंने जोर दिया कि उद्योग और सरकार के साथ साझेदारी बेहतर परिणाम ला सकती है और किसानों को ज्यादा लाभ पहुंचा सकती है. आयी था द्वारा आवाहन किये गये राष्ट्रीय किसान संगठनों की इस महा चौपाल में देश की 25 शीर्ष किसान संगठन शामिल हुए जिनके नाम तथा उन कृषक संगठनों के नाम निम्नानुसार हैं। डॉक्टर त्रिपाठी मे अंत में किसानों की एकता की ज़रूरत पर ज़ोर देते हुए कहा कि अब वक़्त आ गया है कि किसानों को धर्म , जाति- पाति ,भाषा बोली ,क्षेत्रीयता, राजनीतिक दलबंदी से ऊपर उठकर खेती और किसानों के मुद्दे पर निशर्त एक होना होगा और आगामी चुनावों में सरकार के चेयरमैन निर्णायक भूमिका निभाकर अपनी नवोदित शक्ति का परिचय देना होगा। उन्होंने देश की सभी शीर्ष किसान संगठनों से आह्वान करते हुए कहा कि,
खुदी को कर बुलंद इतना ,
कि हर बजट से पहले सरकार तुमसे पूछे , कि बताइए आपकी रज़ा क्या है…?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *