Chhattisgarh Kondagaon

तूफ़ानों की मार से किसान फिर हुए लाचार

अन्नदाता हेतु समसामयिक लेख

प्राकृतिक आपदा से कृषि क्षेत्र के संरक्षण की स्पष्ट नीति का नितांत अभाव

सरकारों के साथ युगलबंदी करके विदेशी बीमा कम्पनियां चाँदी काट रही है और किसान बीमा के नाम पर भी केवल ठगा ही जा रहा है ।

कृषि को उद्योग का दर्जा दिए बिना उच्च लागत वाली नक़दी फसलों को आपदाओं से सुरक्षा मिलना कठिन

कोण्डागांव। बीते हफ़्ते भर में दो बार तबाही बनकर आए आंधी, तूफान और ओलावृष्टि की वजह से देश  के कई हिस्सों में खेती को भारी नुकसान हुआ है. कई ऐसे किसान है जिनकी पूरी फसल ही तबाह हो गई है. वही हाई वैल्यू क्रॉप वाली फसलें तथा, बागवानी के तहत की गई फल, फूल की खेती को भी बड़ा नुकसान हुआ है.प्रकृति की इस आकस्मिक मार से किसान बिलबिला उठा है । इस नुकसान की भरपाई करने की अब तक सरकार द्वारा जो नीतियां बनायी गई है तथा जिनके आधार विभिन्न योजनाओं को क्रियान्वित किया गया है, वह कदापि पर्याप्त नहीं है. ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा किसानों की आय को दो गुना करने के सारे दावे और वादे खोखले से दिख रहे हैं. जब खेती के क्षेत्र में कार्यरत लोगों के आय सुरक्षा की गारंटी नहीं होगी तब तक नई पीढ़ी का इस ओर आना संभव नहीं हो पायेगा. जिस प्रधानमंत्री किसान बीमा योजना के कशीदे पढते हुए सरकार नहीं थक रही है वास्तव में यह योजना भी कई खामियों के चलते किसानों का मौसम की मार से तथा उससे होने वाली हानि से बचाव करने में सक्षम सिद्ध नहीं हुई है। इस बीमा योजना की जटिल प्रावधानों का हाल यह है कि कई राज्यों के कृषि मंत्री भी इसे भलीभाँति आज तक भलीभांति नहीं समझ पाए हैं , फिर बिचारे किसान की तो बात ही क्या है।

आज निवेश कर्ता अपने निवेश पर हर तरह की जोखिम से सुरक्षा चाहता है यहाँ तक कि उपभोक्ता अपनी मोटरसाइकिल, फ़्रीज़ तक का इंश्योरेंस पहले करवाता है उपभोग बाद में शुरू करता है जबकि किसानों की लाखों रुपयों की खेती जो कि प्राय: बैंक अथवा साहूकार से कर्ज़ लेकर की गयी होती है वह प्रकृति की भरोसे खुले आसमान में पड़ी रहती है जिसे जब कभी बाढ़ कभी सूखा कभी तूफ़ान , कभी भी आकर नेस्तनाबूद कर जाता है , फिर किसान के सामने सिर पीट वे और हाथ मलने के अलावा और कोई चारा बचता नहीं है ।

वास्तव में जब तक कृषि को भी उद्योग का दर्जा नहीं दिया जाएगा, तब तक इसकी मूलभूत समस्याओं का निराकरण संभव नहीं है. उच्च मूल्य वाली खेती मसलन, कॉफी, काजू, काली मिर्च, फूल, फल और बागवानी इत्यादी की खेती के लिए उचित और सरल बीमा नीति की नितांत आवश्यकता है. हालांकि सरकार द्वारा फसल बीमा योजना की शुरुआत की घोषणा की गई और इस क्षेत्र में कई विदेशी कंपनियों को अनुमति दी गई. हालात ये हैं कि अकेले छत्तीसगढ़ राज्य से इन विदेशी कंपनियों ने 800 करोड़ रुपये से भी अधिक की राशि फसल वीमा के नाम पर उगाह ले गई . लेकिन किसानों के फसल तबाह होने पर बीमा मुआवजा राशि के रूप में कहीं 25 रुपये तो कहीं 50 रुपये के चेक किसानों को मिले. किसान ठगे से रह गये. हद तो यह है कि कृषि ऋण लेने वाले किसानों को यह भी पता नहीं है कि उनकी खेती का बीमा हो चुका है तथा बीमा कंपनी को उनकी ऋण की राशि में से ही बीमा की प्रिमियम राशि का भुगतान कर दिया गया है. मध्य प्रदेश में कई किसानों ने तो पाँच रुपये दस रुपये जैसे हास्यास्पद राशि की मुआवज़े के चेक लेने से ही इनकार कर दिया ।

संवेदनहीनता का आलम यह है कि गाँव बिचपड़ीं (गोहना) के किसानों की गेँहू की फसल जल गई ,सरकार ने मुआवजे के स्थान पर प्रदूषण के जुर्माने का नोटिस थमा दिया।
फ़सल बीमा की प्रावधानों के बारे में आज भी किसानों को समुचित जानकारी नहीं है और फसल के बर्बाद होने के बावजूद कई किसान जानकारी के अभाव में समुचित बीमा का दावा भी नहीं कर पाते. बैंक अधिकारियों, सरकारी अमलों की मिली भगत से बीमा कंपनियों की चांदी कट रही है तथा नुकसान झेल रहा है किसान. सीधी सी बात है यह विदेशी बीमा कंपनियां भारत में किसानों का भला करने के लिए , परमार्थ हित के लिए नहीं आयी , बल्कि केवल और केवल मोटे मुनाफे का माल काटना ही इनका एकमात्र उद्देश्य है । यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में 370 करोड़ रुपया एक विदेशी बीमा कंपनी को किसानों के खाते में जमा करना है और वह विगत साल भर से टालमटोल कर रही है यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ सरकार कई चेतावनियों के बाद अब उसे काली सूची में डालने का विचार बना रही है अब भी भला ये बता दे कि जो मॉल लेना था वह तो लेकर यह कंपनी फुर्र हो गई ,अब आप उसे चाहे काली सूची में डालने चाहे पीली सूची में डालते रहें । यह तो केवल एक प्रदेश की बानगी है पूरे देश में इन कम्पनियों ने कैसी लूट मचाई होगी , इसका समुचित आंकड़ा अभी आना शेष है ।

अब सरकार को यह तय करना ही होगा कि वह कृषि क्षेत्र को कितना महत्व देती है. कृषि क्षेत्र के सतत विकास और इससे जुड़ी आबादी के सर्वांगिण विकास और हितों की सुरक्षा के लिए एक व्यापक नीति की आवश्यकता है. हर बार की तरह ,केवल चुनावों के पहले किसानों को झुनझुने थमाने से काम चलने वाला नहीं है । कृषि क्षेत्र को अब तक दोयम दर्जा में रखा गया है. जिस प्रकार उद्योगों के संरक्षण के लिए वित्त पोषण सहित अन्य बेल आउट पैकेज की योजनाएं है, उसी तरह की योजनाओं की आवश्यकता कृषि क्षेत्र का भी है. केवल ऋण माफी की घोषणाओं से कृषि क्षेत्र की स्थिति में कोई सुधार नहीं आने वाला.  नई पीढ़ी चमकदार कैरियर की चाह रखती है और जब तक उसे कृषि क्षेत्र में सुरक्षित कैरियर की संभावना नहीं दिखेगी उनका इस क्षेत्र के प्रति आकर्षण नहीं होगा. कृषि से मोहभंग होना देश के विकास पर ग्रहण लगने जैसा है., और भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश के लिए यह स्थिति बेहद ही शोचनीय तथा त्रासद होगी।

डॉ राजाराम त्रिपाठी
राष्ट्रीय समन्वयक
अखिल भारतीय किसान महासंघ
9425258105

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