Chhattisgarh Raipur

चौथी पारी और हमारी बारी के दावे

  • वक्त से पहले बढ़ी चुनावी सरगर्मी

रायपुर: छत्तीसगढ़ का सियासी पारा इस कदर चढ़ा हुआ दिख रहा है मानो राज्य में चुनाव चार महीने दूर नहीं, बल्कि 14 दिन बाद ही मतदान की तारीख तय हो चुकी हो।
दोनो बड़े दलों के शीर्ष नेताओं के दौरे होने लगे हैं, दावे तो ऐसे किये जा रहे हैं जैसे मतदान और मतगणना की जरूरत ही नहीं। जीत तोउनकी हो चुकी है, बस शपथ लेकर पद संभालना ही शेष है। लगातार तीन बार चुनाव जीतकर सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी अपने काम के बूते दावा कर रही है कि चौथी बार भी उनकी ही सरकार बनेगी, वहीं विपक्ष को लगता है कि अबकि बार तो जनता उन्हें मौका देने को आतुर ही बैठी है। नाहक मतदाताओं के बीच जाकर मेहनत-मशक्कत की क्या जरूरत है? सो राजधानी में बैठकर हर मसले पर बयानों के बांण छोड़ते रहिये, भ्रष्टाचार का राग गाइये और बीच-बीच में प्रमुख पदों के लिये अपना दावा जताते रहिये।

राज्य में जमीनी हकीकत परखी जाए तो चुनावी तैयारियों की दृष्टि से भारतीय जनता पार्टी आज की स्थिति में प्रमुख विपक्षी दल कांगे्रस से कोसों आगे नजर आती है। बस्तर में प्रधानमंत्री श्री मोदी की सभा, सरगुजा में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह का जलवा बिखेरना, अब फिर से दुर्ग-भिलाई में पीएम मोदी की सभा। मुख्यमंत्री का पिछले चार महीने से लगातार प्रदेश के हर छोटे-बड़े कस्बे तक जनता के बीच पहुंचना और हर जगह बड़ी भीड़ का मुख्यमंत्री के स्वागत में उमडऩा, हर जगह करोड़ों के विकास कार्य गिनाना और नई घोषणाएं करना। शिक्षाकर्मियों का मसला, जिससे विपक्ष को सबसे ज्यादा उम्मीद थी वह भी डा. रमन ने छीन लिया। इस लिहाज से देख जाए तो भाजपा ने जिस तरह प्रदेश की सत्ता दूसरी और तीसरी बार हासिल की, उन परिस्थितियों और आज के हालात में कोई अंतर तो है नहीं। आज भी विपक्ष के पास मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह के सामने चेहरे का संकट मौजूद है। पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी तो उलटे इस बार खुलकर कांग्रेस के खिलाफ मैदान में मौजूद हैं। महज कुछ सीटों पर नहीं बल्कि पूरे 90 सीटों पर ताल ठोंकने की तैयारी में हैं। बसपा के साथ चुनावी तालमेल के मूड में फिर कांगे्रस नहीं दिख रही है। पिछले साढ़े चार साल से भ्रष्टाचार का राग गा रहे कांगे्रसी एक भी मामले में सरकार को कठघरे में खड़ा कर पाने में नाकाम रहे, मैं यह नहीं कहता कि प्रदेश में सत्ता पक्ष के सभी नेता-अफसर पाक साफ हैं। किंतु विपक्ष अपनी तैयारियों से न तो किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का ऐसा तमगा लगा सका जिसके चलते उसे पद छोडऩा पड़ा हो, या जेल की यात्रा करनी पड़ी हो। जिस सीडी के उजागर होने से प्रदेश की सियासत में भूचाल आ जाने और सत्तापक्ष की साख मटियामेट हो जाने की खुशफहमी थी वह भी महज मीडिया के लिये मसाला ही ज्यादा साबित हुई। तो फिर ऐसी कोई नई तैयारी तो कांगे्रस की ओर से दिख नहीं रही जिसे लेकर कहा जा सके कि हां विपक्ष की यह नई रणनीति जनता को जमेगी।

कांगे्रस पार्टी शायद यह भूल रही है कि इस बार डा. रमन के पास अपने कामों के अलावा केंद्र सरकार के चार साल के काम भी हैं गिनाने को। सत्ता पक्ष की ओर से यह तय हो चुका है कि उसका चेहरा इस बार भी डा. रमन ही होंगे, उनके पीछे अबकि बार मोदी-शाह की जोड़ी का मजबूत चुनावी तंत्र भी पूरी ताकत से लगा रहेगा। तो क्या कांगे्रस पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व मोदी-शाह जैसा ही कोई मजबूत चुनावी मैकेनिजम लेकर छत्तीसगढ़ में उतरने वाला है? क्या पार्टी राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों को छोड़कर छत्तीसगढ़ पर फोकस करेगी? या फिर यूं ही पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी महीने या पखवाड़े में एकाध बार छत्तीसगढ़ का दौरा कर चुनावी हवा का रुख बदलने का भ्रम पालते रहेंगे? क्या कांगे्रस पार्टी का प्रदेश नेतृत्व इतना तैयार है कि पंद्रह साल से सत्ता पर काबिज और अब देश की सबसे मजबूत पार्टी बन चुकी सत्ताधारी पार्टी को सत्ता से उतार फेंकेगी ? ऐसे कई सवाल प्रदेश की सियासी फिजां में अभी तैर रहे हैं। आगे ऐसे सभी सवालों का विश्लेषण हम करते रहेंगे।

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