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जन्माष्टमी विशेष- बस्तर में हैं सैकड़ों साल पुरानी बांसुरी, पीढ़ी दर पीढ़ी होता है बांसुरी का हस्तांतरण

रायपुर। बस्तर के आदिवासी आज  भी अपनी परंपराओं और संस्कृति को सहेज कर रखे हुए हैं। आदिवासियों की संस्कृति का एक अमूल्य हिस्सा है उनके पारंपरिक वाद्य यंत्र। इनमें से एक है यहां बहुतायात में बजाई जाने वाली बांसुरी। बस्तर में बांसुरी का अलग ही महत्व है। यहां एक नहीं अनेक प्रकार की बांसुरी बनाई जाती है और उसे कई तरह से बजाया भी जाता है। यही नहीं यहां के आदिवासियों में पीढ़ी दर पीढ़ी खानदानी बांसुरी का हस्तांतरण होता है। इस बांसुरी को आदिवासी कभी बेचते  भी नहीं हैं बल्कि अपने बुजुर्गों की निशानी मानकर हमेशा अपने साथ रखते हैं।

अनेेक तरह की बनती है बांसुरी
आदिवासी वाद्य यंत्रों के जानकार अनूप रंजन पांडे के अनुसार स पूर्ण बस्तर में अलग अलग क्षेत्र में अलग तरह की बांसुरी का प्रचलन है। यहां रहने वाली जनजातियां अपनी सुविधा और पहचान के अनुरूप ही बांसुरी बनाती हैं। वे बांसुरी का नाम भी एक दूसरी जनजाति से अलग रखती हैं। उसे वे बजाती भी अलग तरह से हैं। बस्तर के एक हिस्से में दो छेद, चार छेद और पांच छेद की बांसुरी बजाई जाती है। इसी तरह आड़ी बांसुरी, धमधाही बांसुरी, हलु बांसुरी और  ालुआ बांउसी आदि बांसुरियां यहां पाई जाती हैं।

बजाने का तरीका  ाी अलग होता है
जब आदिवासी शिकार करने जाते हैं तो सुलूड़ बांसुरी बजाते हुए जाते हैं। इस धुन को सुनकर आदिवासी समझ जाते हैं कि गांव के लोग किस ओर शिकार पर जा रहे हैं जिससे उनके क्षेत्र का पता चलता रहता है और वे एक दूसरे से  ाटकते नहीं हैं। इसी तरह  ालुआ बांउंसी बजाने का तरीका भी बिल्कुल अलग है। बांसुरी के एक सिरे को मुंह में र ाते हैं और दूसरे सिरे को एक पानी से भरी प्लेट या कटोरी में डुबाकर रखते हैं। इसी तरह कुछ जनजातियां आड़ी बांसुरी बजाते हैं तो कुछ उसे सीधे रखते हैं।

नहीं बेचते बांसुरी
आदिवासियों की ऐसी मान्यता है कि बांसुरी से उनके आराध्य देवी देवताओं तक पहुंचने वाली धुन निकलती है। अलग अलग देवी देवताओं की आराधना के लिए आदिवासी अलग अलग धुन बजाते हैं। ऐसा भी माना जाता है कि बांसुरी की धुन में उनके बुजुर्गों का आशीर्वाद  भी शामिल रहता है। इसलिए आदिवासी अपनी खानदानी पारंपरिक बांसुरी नहीं बेचते बल्कि विभिन्न तीज त्यौहार और समाजिक कार्यक्रमों में इसे बजाते हैं। हालाकि वर्तमान समय में नारायणपुर के शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग अब व्यवसायिक दृष्टि से बांसुरी का निमार्ण कर उन्हें बेच रहे हैं।

कृष्ण लीला से है संबंध
बस्तर एंव यहां के आसपास  खुदाई के दौरान श्रीकृष्ण  भगवान की सैकड़ों साल पुरानी मूर्तियां पुरातत्व के रूप में निकल रही हैं। मूर्ति के साथ ही बांसुरी  भी अवशेष के रूप में मिल रही है। इसे देखकर यही लगता है कि यहां के आदिवासी श्रीकृष्ण भगवान के भक्त रहे होंगे। छत्तीसगढ़ में बांसुरी के प्रणेता आदिवासी समुदाय ही है। आदिवासियों के इस वाद्य यंत्र का उपयोग अन्य स्थानीय समुदाय  भी करने लगे। धीरे धीरे यह इस कवाद्य यंत्र की धुन जंगल से निकल शहर की गलियों में  भी सुनाई देने लगी।

ऐसे बनती है बांसुरी
बांस की लकड़ी में छेद कर उसे बांसुरी की शक्ल दी जाती है। बांसुरी की मीठी धुन सुनने वाले बस्तर के आदिवासी अपनी परंपरागत बांसुरी में आज भी वाशर की शक्ल वाला 72 साल पुराने सिक्कों का उपयोग करते हैं। क्योंकि इन सिक्कों के बीच में छेद होता है जिससे आसानी से हवा आरपार हो जाती है और मधुर धुन निकलती है। अगर वर्ष 1943 में निर्मित तांबे का सिक्का नहीं मिलता तो नट-बोल्ट के साथ उपयोग किए जाने वाले वाशर से काम चला लेते हैं।

बांसुरी की परंपरा बहुत पुरानी है
गुरूकुल परंपरा के संस्कृति गुरू डॉ विजय चैरसिया के अनुसार बस्तर में बनी बांसुरियों का उपयोग वनांचल में लंबे समय से होता आ रहा है। राह चलते या नृत्य करते हुए इसे हवा में लहराकर ग्रामीण इसकी मीठी धुन का आनंद लेते हैं। इसे बनाने के लिए सबसे जरूरी होता है धातु का एक छल्ला। बस्तर के आदिवासी छल्ले के रूप में करीब 72 साल पुराने एक पैसे का उपयोग करते आ रहे हैं। ब्रिटिश सरकार द्वारा जारी इस सिक्के के बीच में एक बड़ा छेद होता है। तांबे के इस सिक्के को बस्तर में काना पैसा तो राज्य के मैदानी इलाकों में भोंगरी कहा जाता है।

मुंह मांगी मिलती है कीमत
बड़ा छेद वाले तांबे के पैसे को वर्षो से ग्रामीण सहेज कर रखते रहे हैं, लेकिन 72 साल पुराना यह सिक्का अब मिलना दुर्लभ हो गया है। गांव में करीब 10 परिवार बांसुरी बनाने का काम करते हैं। बस्तर के हाट-बाजारों में इस बांसुरी की काफी मांग है। बांसुरी के पुराने शौकीन अभी भी बस्तर आते हैं और सौ रुपये की बांसुरी में पुराना सिक्का लगा होने पर मुंहमांगी कीमत देने को तैयार रहते हैं। लेकिन पीढियों से चली आ रही बांसुरी को आदिवासी बेचने से आज  भी हिचकिचाते हैं।

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