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Chhattisgarh Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति  रायपुर, 04 दिसम्बर 2017

मुखिया के मुखारी

प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी की सरकार इन दिनों असहज है और प्रथमदृष्टा इसके लिए जिम्मेदार सरकार दो  मंत्री हैं, जिनके अधीन स्कूल शिक्षा तथा पंचायत जैसे बड़े व महत्वपूर्ण विभाग है। दोनों मंत्री अपनी-अपनी कॉलर खड़ी करके अपने विभागों की उपलब्धियों का बखान कर रहे हैं लेकिन इन दोनों विभागों के अधीन काम करने वाले पौने दो लाख से अधिक शिक्षाकर्मी जिस तरह प्रदेश की सड़क, चौक-चौराहों और गांवों में सरकार के कपड़े फाड़ रहे हैं, वह प्रमाणित करता है कि दोनों मंत्री अपने विभाग के कामकाज में कितनी रुचि लेते हैं और बाकी के अन्य कामों में उनकी कितनी दिलचस्पी रहती है। 

अगले साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इन दोनों मंत्रियों की राह बेहद कठिन दिख रही है। शायद यही वजह है कि हड़ताली शिक्षाकर्मियों के बारे में वे ऐसे बयान दे रहे हैं, जो आग में घी का काम कर रहे हैं। एक मंत्री ने तो शिक्षाकर्मियों को राज्य सरकार के लिए पनौती बताते हुए इसकी ठीकरा अविभाजित मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार पर फोड़ते हुए कहा कि इसे प्रदेश का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि जिन्हें ठीक से अंग्रेजी की जानकारी नहीं है, वे शिक्षाकर्मी स्कूलों में अंग्रेजी पड़ा रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि इस बात का अचानक ज्ञान इस मंत्री को अभी कैसे हुआ और अगर उन्हें यह जानकारी पहले से थी, तो उसे दुरुस्त करने के लिए क्या कदम उठाए। 

वैसे तो अपनी मांगों को लेकर प्रदेश के शिक्षाकर्मी बीते सत्रह सालों से संघर्ष कर रहे हैं लेकिन उन्हें अब तक सफलता नहीं मिली। राज्य बनने के बाद कांग्रेस सरकार की पुलिस ने तो आंदोलन पंडाल में घुसकर खूब धोया था। तब भाजपा के वर्तमान सत्तीसन नेता इन शिक्षाकर्मियों के हमदर्द बन गए थे और अब भाजपा सरकार उन पर अत्याचार कर रही है तो कांग्रेसी और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस के नेता घडिय़ाली आंसू बहा रहे हैं। 

बहरहाल बात हो रही थी कि स्कूल शिक्षा विभाग के मंत्री ने शिक्षाकर्मियों की समस्याओं के समाधान के लिए क्या कबी कोई प्रयास किया। जिस मंत्री के परिवार के सदस्य शिक्षाकर्मी हों, जिसने अपनी पत्नी की जगह साली को परीक्षा में शामिल कराकर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था को शर्मसार किया हो, अगर वही मंत्री शिक्षाकर्मियों को पनौती बताने लगे तो साफ जाहिर है कि यह मंत्री सरकार और अपनी पार्टी का शुभचिंतक तो नहीं है। 

रही बात दूसरे मंत्री की तो उसके विभाग के अधीन भी शिक्षाकर्मी हैं, जो अपनी मांगों को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षाकर्मी बार-बार कह रहे हैं कि संविलियन से कम उन्हें कुछ भी मंजूर नहीं है लेकिन यह मंत्री उनके जले पर नमक छिड़कते हुए कहते हैं कि बस संविलियन नहीं होगा, बाकी पर विचार कर सकते हैं। प्रश्न यह है कि सरकार ने शिक्षाकर्मियों की संविलियन की मांग को अपनी प्रतिष्ठा से क्यों जोड़ दिया है। इसके पीछे वजह सरकार के सलाहकार और इन दोनों विभागों के मंत्री हैं, जो सरकार को सहज स्थिति में नहीं रहने देना चाहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार के दबाव में शिक्षाकर्मी उग्र होते जा रहे हैं और स्थिति विस्फोटक होने लगी है। मंत्रियों ने अपने विभागों के कामों को खुलकर बताया लेकिन यह नहीं बताया कि शिक्षाकर्मियों के लिए उन्होंने क्या सोचा है। उनकी रुचि तो बस बड़े ठेकों और खरीद पर रहती है। उनके दलाल व कमीशनखोर समर्थक आबाद रहें, उन्हें बस इसी बाच की चिंता रहती है। शायद उन्होंने मान लिया है कि अगली बार सरकार बनाना आसान नहीं है लिहाजा जितनी ज्यादिती की जा सकती है, की जाए। वैसे सोशल मीडिया में एक बात तेजी से वायरल की जा रही है कि शिक्षाकर्मियों की बर्खास्तगी के पीछे भाजपा सरकार का एक गुप्त एजेंडा है। शिक्षाकर्मियों को हटाकर उनके स्थान पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों की भर्ती कर दी जाए, इससे उग्र शिक्षाकर्मियों से निजात मिलेगी और अगले चुनाव में नए शिक्षाकर्मी स्वयंसेवक पार्टी के मददगार होंगे। 

चोखेलाल
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