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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति  रायपुर, 07 दिसम्बर 2017

मुखिया के मुखारी

महिलाओं की सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने कई कदम उठाए हैं। उन्हें सुरक्षा देने के लिए समय-समय पर जागरूकता अभियान भी चलाया जाता है और कामकाजी महिलाओं की सुरक्षा के लिए सभी सरकारी दफ्तरों में किसी महिला की अध्यक्षता में विशाखा कमेटी को गठन भी किया गया है ताकि उत्पीडऩ से प्रभावित महिलाए बे-बाकी के साथ अपनी व्यथा बता सकें।

इतने सब इंतजामात के बाद भी प्रदेश में ऐसे अफसरों की कमी नहीं है जो आंखों से काजल चुराने में माहिर हैं। उत्तर छत्तीसगढ़ के एक शहर में एक अफसर ने जो कृत्य किया है, उसको जानकर किसी भी उच्चाधिकारी को खामोश नहीं बैठना चाहिए। इस अफसर ने स्वच्छता अभियान के तहत बनाए जाने के एवज में एक महिला को अपने साथ रात गुजारने का न्योता दे दिया। इस तरह का दुस्साहसी काम वही अफसर कर सकता है जो राजनीतिक रसूख रखता हो क्योंकि घटना के कई दिन गुजर जाने के बावजूद आज तक उस अफसर का बाल भी बांका नहीं हो पाया है। दरअसल उस महिला के मकान में सरकारी खर्च पर शौचालय बनाया जाना था। पहले उससे रिश्वत की पेशकश की गई पर जब उसने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो सम्बंधित अधिकारी ने कहा कि उसका काम हो जाएगा परंतु इसके बदले में उसे उसके साथ एक रात गुजारनी होगी। किसी भी स्वाभिमानी महिला को यह बात नागवार लगनी थी, लिहाजा उसे भी अफसर की बात खराब लगी और पहुंच गई थाने। पर जैसा कि थानों में आमतौर पर होता है। महिला की शिकायत सुनकर उसे जांच में ले लिया गया। संकेत साफ हैं कि अगर पुलिस अगर किसी मामले की जांच शुरू कर रही हो मतलब यह है कि आरोपी को पूरा अवसर दे रही है।

खैर इस घटना के बाद अब तक यह पता नहीं लग पाया है कि स्थानीय उच्चाधिकारियों ने इसे कितनी गंभीरता से लिया क्योंकि अभी तक यह खबर नहीं आई है कि उस महिला के मकान में शौचालय का निर्माण हो गया है। दुष्चरित्र के मामले में सत्तारूढ़ दल के मंडल और जिला स्तरीय नेताओं ने भी रिकॉर्ड तोड़ दिया है।

प्रदेश के एक छोटे से कस्बे से खबर आ रही है कि किराए पर अपनी दुकान देने वाले भाजपा के स्थानीय छुटभैये नेता ने अपनी महिला किराएदार को पोर्न मूवी दिखाकर उसके साथ दुष्कर्म करने की कोशिश की। वह उस पर लगातार अश्लील फब्तियां कसता रहा और आखिरकार एक दिन अपने इरादे जाहिर कर दिया। स्वाभाविक है कि मामला पुलिस तक पहुंचा परंतु इस मामले में भी आरोपी सत्तारूढ़ दल से सम्बंधित है, लिहाजा पुलिस ने महिला की बात को अंतिम सत्य माने बिना जांच करने का आश्वासन दिया और अब उस महिला पर शिकायत वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है।

यहां सरकार की नीयत पर कोई संदेह नहीं है। शक की सुई तो उन निचले स्तर के अफसर की तरफ घूमती है, जो यह मानकर चलते हैं कि किसी अफसर या सत्तारूढ़ दल के नेता के खिलाफ कार्रवाई कर दी गई तो उन्हें तबादला आदेश थमा दिया जाएगा अन्यथा आला अफसरों के गुस्से का शिकार होना पड़ेगा। सच्चाई तो यह है कि सरकार चलाने वाले कभी भी किसी अफसर को यह नहीं करते कि कानून विरोधी काम करें। अधिकतर घटनाएं तो उनके पास तक पहुंच ही नहीं पाती हैं। निचले स्तर के अफसर खुद ही मन बना लेते हैं कि उन्हें कार्रवाई नहीं करनी है या उसे लम्बित कर देना है। लेकिन उनकी इस प्रकार की मानसिकता का विपरीत असर राज्य सरकार की छवि पर पड़ता है और विरोधियों को यह कहने का अवसर मिलता है कि आरोपियों को सरकार की सरपरस्ती है। ऐसी स्थिति में खासकर पुलिस महकमे के आला अफसरों को सख्ती दिखाने की जरूरत है और स्थानीय प्रशासन को बेहद संजीदगी के साथ महिला उत्पीडऩ के मामलों में हस्तक्षेप करने की जरूरत है अन्यथा आक्रोश की चिंगारी को लपट बनने में देर नहीं लगेगी।

चोखेलाल
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