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Chhattisgarh Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति  रायपुर, 25 दिसम्बर 2017

मुखिया के मुखारी

खूब लड़े…जमकर लड़े…पूरी रात लड़े…कई बार गिरे.. जख्मी भी हुए परंतु लड़ते रहे और आखिरकार पराजित हो गए क्योंकि सामने बाहुबलियों की सेना थी, जिनके तरकश में हर प्रकार के तीर थे। चूंकि लड़कर हारे इसलिए सेनापति ने कंधा थपथपाया और कहा कि सामने वाले बाहुबलि हैं, उन्हें विधानसभा के मैदान पर पराजित करना असंभव है, इसलिए अब अगली लड़ाई जन अदालत में लड़ी जाएगी। सेनापति ने इस बात के लिए भी सैनिकों की पीठ थपथपाई कि उन्होंने जमकर मुकाबला किया और अगर यही जज्बा बना रहा तो अगले सालंत तक राज्य विधानसभा की तस्वीर बदल सकती है।

कांग्रेस ने जब विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था, तभी उसे अच्छी तरह पता था कि संख्या बल के आधार पर उसकी पराजय तय है। सरकार भी जानती थी कि उसको जीतने से कोई भी नहीं रोक सकता है, यही वजह है कि सरकार के इशारे पर विधानसभा अध्यक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराने की अनुमति दे दी। दोनों की राजनीतिक दल अविश्वास प्रस्ताव के माध्यम से एक-दूसरे को बे-नकाब करने में काफी हद तक सफल रहे। यह बात अलग है कि सरकार के दो मंत्री बात-बात पर अपने स्वाभाव के अनुरूप क्रोधित होते रहे, जिसके कारण उन्हें विधानसभा अध्यक्ष की डांट सुननी पड़ी परंतु क्या करें, यह उनकी मैन्युफैक्चरिंग समस्या है। बात-बात पर उलझना और आपा खो देने के कारण ही सरकार को कई बार अप्रिय स्थिति का सामना करना पड़ा है लेकिन वे अपने स्वभाव से बाज नहीं आते हैं।

बहरहाल अविश्वास प्रस्ताव पर घण्टों की बहस के बाद, पूरी रात जागरण करने के बाद दोनों की दलों को किस तरह का फायदा हुआ, इसे तो वही बता सकते हैं लेकिन जनमानस की दिनचर्या पर इसका कोई असर नहीं हुआ क्योंकि वह पटवारी से लेकर बड़े अफसर तक, स्कूल से लेकर अस्पताल तक की अव्यवस्थाओं से दो-चार हो रहा है। उसे इस बात से मतलब नहीं है कि राज्य में सरकार किसकी है, वह तो यह जानता है कि अस्पताल पहुंचे तो उसे देखने के लिए डॉक्टर मिल जाएं, उसकी जांच हो जाए औ्र दवाइयां मिल जाएं। उसकी इच्छा है कि स्कूलों में मास्टर हों ताकि उसके बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल जाए। उसकी अभिलाषा तो बस इतनी है कि खसरा-नक्शा लेने अगर कभी तहसील में जाना पड़ जाए तो पटवारी साहब मिल जाएं और चक्कर चलवाए बिना, रिश्वत लिए बिना उसे कागज मिल जाए, परंतु सदन के अंदर बड़ी-बड़ी बात करने वाली सरकार के मंत्री बेहद बेशर्मी के साथ कहते हैं कि अस्पतालों में इतने हजार पद खाली है, स्कूलों में मास्टरों के इतने हजार पद रिक्त हैं।

सवाल बहुत बड़ा है कि चौदह साल बे-मिसाल सरकार चलाने के बाद भी अगर मास्टर और डॉक्टर की व्यवस्था नहीं की जा सकी है तो उपलब्धियों में वे किन बातों को मान रहे हैं. अब सरकार में बैठेंगे तो कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा परंतु इस सरकार में वही काम हो रहे हैं, या किए ए हैं, जिनमें बड़ा कमीशन मिलता रहा है। सरकार की विकास की परिभाषा निर्माण कार्यों के बाद रुक जाती है। चकाचक राजधानी को देखकर व आत्ममुग्ध होती रहती है। उसे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में पीने का पानी नहीं है, स्कूलों में छत नहीं है और अस्पतालों में डॉक्टर, जांच मशीनें तथा दवाइयां नहीं है। किसानों की दुर्दशा को बहुजन समाज पार्टी के विधायक केशव चंद्रा की इस बात से समझा जा सकता है कि प्रदेश में गांजा तो आसानी से बेचा जा सकता है परंतु धान बेचने के लिए किसान को पसीना बहाना पड़ रहा है। प्रदेश चुनावी वर्ष में प्रवेश कर चुका है। जिस सरकार ने चौदह सालों में बुनियादी सुविधाओं को दुरस्त करने में कोई प्रशंसनीय पहल नहीं की है, उससे बचे हुए दस महीने और अगले पांच साल (जिसका वह सपना देख रही है) किसी भी प्रकार का भागीरथी प्रयास करने की उम्मीद करना प्रदेशवासियों के लिए आत्मघाती फैसला साबित हो सकता है।

चोखेलाल
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