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Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति रायपुर, 27 दिसम्बर 2017

मुखिया के मुखारी

छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस सुप्रीमो अजीत जोगी ने भले ही कांग्रेस से नाता तोड़ लिया हो परंतु कांग्रेस उनके फोबिया से अब तक नहीं उबर पाई है। सायद यही वजह है कि कांग्रेस नेताओं को कहना पड़ रहा है कि अजीत जोगी की अगर कांग्रेस में वापसी हुई तो राजनीति करने से बेहतर वे घर में बैैठना पसंद करेंगे। एक ही ट्रेन, एक ही बोगी में बैठकर मीलों तक सफर करने के बाद कांग्रेस नेताओं का यही कहना रहता है कि अच्छा, अजीत जोगी उसी बोगी में थे…। दरअसल कांग्रेस नेताओं को अनुमान नहीं था कि कांग्रेस छोडऩे के बाद अजीत जोगी इतने सक्रिय हो जाएंगे। सबको यही लग रहा था कि संसाधनों के अभाव व कमजोर शारीरिक स्थिति के चलते अजीत जोगी थोड़ा हो-हल्ला करेंगे और फिर उनका भी हश्र उन नेताओं की तरह हो जाएगा, जिन्होंने कांग्रेस छोडऩे के बाद सरकार बनाने की चेष्टा की थी, लेकिन यहां तो पाला उलटा ही पड़ा। अब नए साल में अजीत जोगी हेलिकॉप्टर से महीने भर में प्रदेशभर में सौ सभाएं करने की तैयारी में हैं, जिसके कारण कांग्रेसियों के माथे पर बल पड़ता दिख रहा है।

सच्चाई तो यह है कि प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष पर अधिक यकीन नहीं है क्योंकि उत्तरप्रदेश में जब उन्होंने अपने कट्टर विरोधी समाजवादी पार्टी से हाथ मिला लिया तो अजीत जोगी तो अपना ही खून हैं। चुनाव से पहले अगर किसी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के कानों में यह बात डाल दी कि अजीत जोगी के साथ मिलकर चुनाव लडऩे पर सरकार बनाना सुनिश्चित है और इस बात को मैदानी स्तर पर क्रियान्वित कर दिया गया तो यकीन मानिए प्रदेश कांग्रेस के कई बड़े चेहरे घर में ही बैठे दिखेंगे।

वैसे अजीत जोगी सस्ता सौदा करने वालों में नहीं है। उनकी सोच है… मेहनतकश जब लोगों से अपना हिस्सा मांगेंगे, इक खेत नहीं, इक गांव नहीं, हम सारी दुनिया मांगेंगे। अजीत जोगी का जैसा स्वभाव है कि अगर मिल जुलकर चुनाव लडऩे की नौबत आती है तो वे मुख्यमंत्री से कम पद में समझौता करने वालों में नहीं है। ऐसी स्थिति में उन कांग्रेसियों की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है जिन्होंने अजीत जोगी और उनके परिवार को बाहर का रास्ता दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, वे इसे कैसे बर्दाश्त करेंगे। सरकार बनाने के लिए ही वे कई बार जेल गए, लाठी-डण्डे खाए, मुकदमे झेले और जब बात बनने लगी तो कुर्सी किसी अन्य को कैसे सौंपी जा सकती है।

कहते हैं कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी स्थायी नहीं होती है। समय के साथ उसमें परिवर्तन होता रहता है। जरूरतों के हिसाब से दामन छोड़े और पकड़े जाते हैं लेकिन छत्तीसगढ़ का परिदृश्य बिलकुल अलग है। यहां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं है। यहां तो कट्टर दुश्मनी है। कांग्रेस के कई नेता अपने पूर्व मुख्यमंत्री का सामना करने से भी बचते हैं. रेलवे स्टेशन पर अगर सामना हो भी गया तो पहले बचने की कोशिश करते हैं और जब इसमें सफलता नहीं मिलती तो हाथ मिलाने का शिष्टाचार निभाते हैं। दोनों ही पक्षों में एक-दूसरे के प्रति बेहद जहर भरा हुआ है। हालांकि इस विषम स्थिति में भाभीजी फंसी हुई हैं लेकिन अजीत जोगी ने कांग्रेस के इस भ्रम को भी तोड़ दिया है कि विधायकी का कार्यकाल पूरा करते ही भाभीजी अपने होम प्रॉडक्शन हाउस में आ जाएंगी। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस जोगी मुक्त हो जाएगी। लेकिन यह मुक्ति कितने दिनों या महीनों की रहती है, यह देखने वाली बात होगी कि अगर मिलकर चुनाव लडऩे की परिस्थितियां निर्मित हुईं तो प्रदेश कांग्रेस के कितने नेता अपने बड़े पदाधिकारियों का साथ देते हैं औ्र बड़े पदाधिकारी हाईकमान को कैसे इसके लिए राजी करेंगे कि अकेले लड़कर भी सरकार बनाई जा सकती है। कुल मिलाकर प्रदेश कांग्रेस के नेताओं और अजीत जोगी के बीच होने वाली लड़ाई आगे चलकर रोचक रूप ले सकती है।

चोखेलाल
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