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Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति  रायपुर, 02 जनवरी 2018

प्रदेश चुनावी वर्ष में प्रवेश कर गया है। माहौल में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देने लगेगा। अब तक खामोश रहने वाले जनमानस में जुबान का एहसास होने लगेगा। तीन महीने बाद उसके स्वर तेज हो जाएंगे और उसके छह महीने बाद वह प्रदेश के चौक-चौराहों पर खड़े होकर राजनीतिक दलों की खामियों को उजागर करने लगेगा।

खैर इस स्थिति को बनने में अभी वक्त है परंतु कुछ लोगों को धैर्य नहीं है। वे अभी से चुनावी मूड पर चले गए हैं। बोलने लगे हैं और कुछ दिनों बाद चिल्लाने भी लग जाएंगे। उन्हें लगता है कि तुरंत चुनाव का ऐलान हो जाए और वे मतदान करके कम से कम इस सरकार को तो हटा दें। लेकिन ऐसे लोगों को अभी धैर्य रखने की जरूरत है। अगले पांच साल के लिए फैसला करना है, इसलिए हड़बड़ी में निर्णय नहीं किया जा सकता है। यह बात कुछ लोगों को समझाई जा सकती है लेकिन जेहादियों को पल्ले इस तरह की बात नहीं पड़ती है। ऐसे लोग सरकार और उसकी कार्यशैली का रोज ही पोस्टमार्टम करते रहते हैं।

ऐसे ही एक जेहादी पाठक ने चोखेलाक के पास एक सामग्री भेजी और आग्रह किया कि उसे मुखिया के मुखारी में अवश्य स्थान दिया जाए। चोखेलाल सैदव अपने सम्मानित पाठकों की राय को महत्व देता आ रहा है क्योंकि ऐसे ही पाठकों ने चोखेलाल को बुलंदियों तक पहुंचाया है। लिहाजा उस पाठक की लिखी हुई मूल बातें आपके सामने प्रस्तुत हैं। सरकार का प्रतिनिधित्व करने वालों को निश्चित रूप से यह बातें पीड़ा पहुंचा सकती हैं, नाराज कर सकती है और गुस्सा भी दिला सकती हैं लेकिन बेहतर होगा कि इन सभी बातों को सुझाव के रूप में लिया जाए और उन कमजोरियों को दूर करने की कोशिश की जाए। इस तरह की बातें लिखने वाला हर व्यक्ति सरकार विरोधी ही हो, संभव नहीं है। हो सकता है वह उसका शुभचिंतक हो तभी तो समय से पहले उन बातों को रेखांकित कर रहा है, जो चुनावी वर्ष में सत्तारूढ़ दल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। यह प्रदेश के एक सामान्य व्यक्ति की भावना है, जिसका सभी को सम्मान करना चाहिए।

आइए, बताते हैं कि चोखेलाल के सुधि पाठक ने क्या लिखा है…….जब राज्य की भाजपा सरकार ने अपना जमीनी हकीकत जानने सर्वे कराया तब उसके नीचे से जमीन खिसक गई। तब सरकार के सिपहसालारों ने सरकार को जनता से जोडऩे के लिए तिहार का खाका तैयार किया ताकि लोगों को यह बताई जा सके कि सरकार जनहितैषी है और वह लोगों के लिए चिंतित है। इस आपाधापी में बिजली बिल बढ़ाकर सरकार ने बिजली तिहार भी मना लिया। सरकारी सर्वे में सरकार को ज्यादा सीटें मिलती हुई नहीं दिखी। हालांकि लोगों में यह स्पष्टता नहीं दिखा कि इस सरकार का विकल्प कौन है लेकिन सरकार के विरोध में ज्यादातर लोग दिखे। सिक्सटी प्लस का टॉरगेट लेकर चुनाव लडऩे का दावा करने वाली भाजपा के खाते में बहुमत के आसपास के सीटों के लाले पड़ गए। सबसे ज्यादा नाराज किसान थे, इसलिए सरकार ने सबसे पहले बोनस तिहार मनाने की घोषणा की। वैसे सरकार ने चार साल पहले बोनस और धान के समर्थन मूल्य बढ़ाये जाने का वादा लोगों से किया था लेकिन सरकार जब तक आश्वस्त थी तब तक किसानों को एक अधेला बोनस नहीं दिया गया। उल्टा एक-एक दाना धान खऱीदने का वादा करने वाली सरकार ने प्रति एकड़ 15 क्विंटल धान ही किसानों से खरीदने का नियम बना दिया, इससे भी किसान नाराज थे। बिजली के दामों में पिछले चार सालों में कई गुना बढ़ोतरी हुई है। हालात यह है कि घर की बिजली बिल देखकर ऐसे लग रहा है जैसे घर में कोई मिल लगी हुई हो। लेकिन इसके खिलाफ  लोग नहीं बोल रहे हैं। तिहार जब मनाने की बात आई तो बिजली तिहार भी मना दिया गया, यह कहकर कि सभी गांव, टोला-पारा में बिजली सरकार ने पहुंचा दी। इसके एवज में कितना बिल बढ़ दिया इसकी कोई बात नहीं हुई। सरकार ने अचानक प्रधानमंत्री आवास के लिए अधिकारियों को टॉरगेट दे दिया है। अधिकारी इस योजना के लिए जमीन ढूंढ रहे हैं और ज्यादा से ज्यादा हितग्राही तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि इस योजना का बहुत ही सकारात्मक असर भी ग्रामीणों में दिखाई देता है। मकान बनाए जाने से ग्रामीण खुश हैं, यह अलग बात है कि यह खुशी वोट में बदलती भी है या नहीं, इसकी कोई गारण्टी नहीं है।

चोखेलाल
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