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Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति  रायपुर, 03 जनवरी 2018

गांव, गरीब, मजदूर, किसान, आदिवासी, सतनामी, युवा, महिलाएं और किन्नरों की चिंता करने के बाद प्रदेश की भाजपा सरकार को चुनावी वर्ष में मीडिया कर्मियों की अचानक याद आ गई। सत्तारूढ़ दल को अच्छी तरह पता है कि वोटों को जब पडऩा होगा पड़ेंगे लेकिन उससे पहले माहौल बनाने का काम तो मीडिया ही करेगी। ठीक है आज मीडिया शिकंजे में है, उसके इशारों पर नाचती है लेकिन जैसे-जैसे चुनाव करीब आते जाएंगे, मीडिया पर शिकंजा कमजोर पड़ता जाएगा। बरसों से प्रताडि़त मीडिया के पास वही मौका होगा, जब वह सत्ता और संगठन को जमकर धोएगी और अपना भड़ास निकालेगी। 

मीडिया की इस भावना को समझने के बाद सरकार ने सोचा कि क्यों न मीडिया कर्मियों पर इमोशनल पासा फेंका जाए। काफी मंथन करने के बाद सरकार ने यह निष्कर्ष निकाला कि क्यों न मीडिया कर्मियों का मीडिया चेक-अप करा दिया जाए। मीडिया में काम करने वालों की कुण्डली वैसे तो सरकार के पास रहती है लेकिन मेडिकल पड़ताल कराने के बाद अब वह पत्रकारों के शरीर की भी कुण्डली बना लेगी ताकि कभी मौका पड़े तो यह कहा जा सके कि अमुक पत्रकार शारीरिक या मानसिक रूप से बीमार है। 

प्रदेश के स्वास्थ्य अमले को यह जवाबदारी सौंपी गई है कि हर जिले में काम करने वाले हर पत्रकार की मेडिकल जांच कराई जाए। उसे क्या-क्या रोग हैं, उसे विस्तार से देखा जाए। वह कितना देख पाता है, वह कितना सोच पाता है और वह कितना चल-फिर सकता है। उसका दिल ठीक है या फिर दिल में सरकार के खिलाफ किसी प्रकार की गंदगी या द्वेष भरा हुआ है, इसका भी ब्योरा एकत्र करने का जिम्मा स्वास्थ्य अमले को दिया गया है। 

महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारों का हेल्थ कैम्प भी नौकरशाही के शिकंजे में फंस गया है क्योंकि विभाग के बड़े-बड़े नौकरशाह केवल उन्हीं पत्रकारों की मेडिकल जांच कराने के पक्षधर में हैं, जो सरकार से मान्यता प्राप्त हैं। बाकी पत्रकार इन नौकरशाहों की नजर में पत्रकार नहीं हैं और उनकी सेहत से सरकार को कोई मतलब नहीं है। इसके लिए बकायदा जनसम्पर्क विभाग से पत्रकारों की सूची मांगी गई है ताकि उन्हें जिलों के सरकारी अस्पताल में बुलाकर परीक्षण कराया जा सके। विवाद की शुरुआत यहीं से शुरू हुई है क्योंकि जनसम्पर्क विभाग में दर्ज पत्रकारों के मुकाबले प्रदेश में चार गुना अधिक पत्रकार जान-जोखिम में डालकर काम कर रहे हैं। मान्यता प्राप्त अधिकतर पत्रकार तो सरकार का यशगान करते हैं या फिर सरकारी सुविधाएं भोगते हैं लेकिन गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या अधिक है, जो प्रदेश के कोने-कोने से ऐसी खबरें निकालते हैं जिसकी सरकारी नुमाइंदे कल्पना भी नहीं कर सकते। 

हालांकि स्वास्थ्य विभाग को सलाह दी गई है कि जिलों के प्रेस क्लब से सूची लेकर पत्रकारों का स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाए लेकिन विभागीय अफसर अड़ गए हैं। इसका कारण तो पता नहीं है लेकिन गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को वे हेय दृष्टि से देखते हैं। उनकी नजरों में ऐसे पत्रकार अप्रशिक्षित व कम पढ़े लिखे होते हैं। इस विवाद के बीच पत्रकारों का स्वास्थ्य परीक्षण का कार्यक्रम खटाई में पड़ गया है। कुछ मीडिया कर्मी चाहते भी नहीं हैं कि सरकार उनका स्वास्थ्य परीक्षण करे क्योंकि यह सभी जानते हैं कि मशीनें झूठ नहीं बोला करती हैं। अब तक कॉलर खड़े करके इस-उस मंत्री, नौकरशाहों के सामने जाकर डींगे हांकते रहे हैं, अब जब पूरे शरीर की स्केनिंग होगी तो पता चल जाएगा कि किसका गुर्दा कितना खराब हो चुका है, किसके लीवर का कितना हिस्सा खत्म हो चुका है और किसे दिखाई या सुनाई देना कम हो गया है। 

बहरहाल सरकार की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता है कि उसने स्वस्थ्य प्रदेश की कल्पना कर रखी है लेकिन तकलीफ इस बात की है कि सरकार ने पत्रकारों के बारे में किन्नरों के बाद सोचा। पत्रकार तो उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता में होने चाहिए लेकिन ऐसा नहीं हो पाया क्योंकि एक विभाग विशेष के माध्यम से पूरी मीडिया को आसानी से कसा जा सकता है, उसे अपने शिकंजे में रखा जा सकता है। इस काम को सरकार ने पूरी ईमानदारी और शिद्दत से किया। यह बात अलग है कि सरकार के इस एजेंडे की आड़ में कुछ लोगों ने मीडिया कर्मियों से अपनी खुन्नस भी निकाल ली, जिसका खामियजा उन्हें चार महीने बाद भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि मीडिया कर्मियों के बारे में एक बात तो जगजाहिर है कि वे दोस्तों को भले भूल जाएं परंतु दुश्मनों के नाम रोज भगवान की तरह रटते हैं और वक्त का इंतजार करते हैं कि कब उन पर हथौड़ा चलाना है। 

चोखेलाल
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