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Chokhelal

मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति रायपुर, 04 जनवरी 2018

भारतीय जनता पार्टी के पर्याय माने जाने वाले एक राष्ट्रीय नेता के बारे में कहा जाता है कि अगर वे किसी के घर जाकर खाना खाते हैं तो खिलाने वाले से तीन लाख रुपए लेते हैं। चूंकि उनका घर-बार-परिवार नहीं है लिहाजा यह राशि वे वनवासी कल्याण आश्रम  में दान दे देते हैं। इसी प्रकार क्रिकेट के भगवान कहने जाने वाले खिलाड़ी के बारे में यह प्रचारित किया जाता है कि किसी के साथ कॉफी पीने के एवज में वे बड़ी रकम लेते हैं, जिसका उपयोग वे अपने एनजीओ में करते हैं।

इन दोनों के बराबर में अब छत्तीसगढ़ के एक नेता आ गए हैं। उन्होंने ऐलान किया है कि उनके साथ किसी को अगर लंच या डिनर करने का अभिलाषा है तो इसके लिए ऐसी इच्छा रखने वाले को उनके राजनीतिक दल के खाते में ग्यारह हजार रुपए जमा करने होंगे। खाना खिलाने का खर्च अलग होगा। यह ऐलान करते हुए उन्होंने यह नहीं बताया कि लंच या डिनर पर उनके साथ कितने समर्थकों की फौज रहेगी और वे खाना घर पर खाएंगे अथवा सितारा हॉटल में। इस घोषणा को तीन दिन से अधिक का समय गुजर गया है, लेकिन नेताजी की अब तक बोहनी नहीं हुई है। हालांकि उनके गुर्गे यह कह रहे हैं कि साहब के साथ लंच-डिनर करने वालों के फोन लगातार आ रहे हैं परंतु साहब की अभी तबियत ठीक नहीं है, इसलिए वे किसी को समय नहीं दे रहे हैं।

प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे इस नेता ने अपनी कीमत सिर्फ ग्यारह हजार लगाई है, यह सोचनीय बात है। दरअसल विधानसभा चुनाव लडऩे को आतुर उनकी पार्टी के सामने धनसंकट शुरू हो गया है। चूंकि वे पार्टी के वन मैन आर्मी हैं, लिहाजा राशि एकत्र करने की सबसे बड़े जिम्मेदारी उन्हीं की है। जिन लोगों ने उनका शासनकाल करीब से देखा और भोगा है, वे उनकी पार्टी को आर्थिक सहयोग करेंगे, इसमें शक है। फिर भी डरा-धमकाकर काफी पैसे एकत्र किए जा चुके हैं और यह कोशिश अनवरत जारी है लेकिन चुनाव लडऩे के लिए बड़ी रकम की जरूरत होगी इसलिए पार्टी के लिए राशि जुटाने की यह कोशिश है।

प्रश्न यह है कि धनसंग्रह का यह तरीका क्या उचित है। कुछ साल पहले तक प्रदेश के नेता अपने समर्थकों के निवास में जाकर उनके परिजनों से मिलते थे, आप-पड़ोस के लोगों के साथ बैठकर बातें करते थे और कई बार लंच या डिनर भी करते थे। उनके इस कदम से उनके समर्थकों का अपने मोहल्ले-समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा बढ़ती थी और वह अधिक समर्थित होकर सम्बंधित पार्टी का काम करता था। अब इक्के-दुक्के नेताओं को छोड़कर शायद ही कोई बड़ा नेता अपने किसी समर्थक के दुख-सुख में शामिल होता हो। अपने नेताओं का यही आचरण देखकर कार्यकर्ता भी पेशेवर हो गए हैं। वे भी कहीं जाने से पहले लाभ-हानि देख लेते हैं।

राजनीति करने वालों और आम जनमानस के बीच एक अपनेपन का रिश्ता होना इस प्रदेश की गौरवशाली परम्पराओं में से एक रही है, जिसमें समाज और प्रदेश का नेतृत्व करने वाले से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने समाज व प्रदेशवासियों के दुख-सुख में खड़ा मिले। केवल चुनावी माहौल में ही वह रिश्तों को भुनाए, इस प्रदेश के लोग इसके आदी नहीं हैं। अब एक राजनीतिक दल के मुखिया ने अपने लंच और डिनर को बेचने की परम्परा शुरू की है, उसकी सफलता और असफलता पर निर्भर करेगा कि अन्य राजनीतिक दल के नेता क्या करेंगे लेकिन खुद के समय को बेचने को राजनीति नहीं व्यवसाय ही कहेंगे। धनसंग्रह करने के अनेक तरीके हैं। इस प्रकार की बाध्यता रखने से उन छोटे कार्यकर्ताओं के मन में क्या गुजरेगी, जिनकी हैसियत पैसे देने की नहीं है परंतु अपने नेता को घर बुलाकर बासी-भात खिलाने की इच्छा रखते हैं।

बताने की जरूरत नहीं है कि प्रदेश में इस प्रकार के स्वभाव और इच्छा रखने वाले कार्यकर्ताओं की बहुतायत है और राजनीतिक दलों के नेताओं के इसी प्रकार के कार्यकर्ताओं की बदौलत गद्दियां मिलती रही हैं लेकिन अब नेता व्यवसाय करने में उतारू हो चुके हैं। उन्हें हर बात के लिए पैसा चाहिए। नेपथ्य में तो प्रदेश में यह भी चल रहा है कि बड़े नेताओं से मेल-मुलाकात कराने के लिए भी कुछ लोग वसूली कर रहे हैं। धीरे-धीरे यह बात सामान्य हो जाएगी और फिर वह दिन दूर नहीं कि जिन लोगों को वोट देकर शक्तिमान बनाया गया है, उनके दीदार के लिए भी चढ़ावा चढ़ाना पड़ जाएगा। कम से कम छत्तीसगढ़ के लिए तो यह परम्परा उचित नहीं कही जा सकती है क्योंकि प्रदेश का आम जनमानस और छोटे कार्यकर्ता आज भी अपने नेता को अपना आदर्श मानते हैं। इस तरह की परम्परा ऐसे कार्यकर्ताओं के मन में राजनीति के प्रति नफरत पैदा करने में देर नहीं लगाएगी। वैसे भी अधिकतर राजनीतिक दल कार्यकर्ताओं की जगह पैड वर्करों के सहारे चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं। इसके बाद कार्यकर्ता इतिहास में ही दर्ज हो जाएंगे।

चोखेलाल
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