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मुखिया के मुखारी

इण्डिया रायटर्स (मासिक पत्रिका) की प्रस्तुति  रायपुर, 05 दिसम्बर 2017

मुखिया के मुखारी

जिलों में होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में सभी प्रकार की व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी उस जिले के कलक्टर की होती है। अच्छे आयोजन के लिए कलक्टर को बधाइयां दी जाती हैं लेकिन इसमें अगर गड़बड़ी हुई तो कलक्टर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। लेकिन भारतीय जनता पार्टी की सरकार में काम करने की जिस संस्कृति को पाला-पोसा गया है, अब उसके परिणाम सामने आने लगे हैं।

बद्जुबानी करना इस सरकार के जनप्रतिनिधियों औ्र नौकरशाहों की आदत में शुमार हो गया है। मंत्री खुले आम नौकरशाहों को धमकाते हैं, महिलाओं व युवतियों के बारे में अशोभनीय टिप्पणियां की जाती है और मौका मिलते ही मीडिया को भी धोने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती है। मंत्रियों और भाजपा के अन्य बड़े नेताओं के इस आचरण का असर अब नौकरशाहों पर भी पडऩे लगा है।

ताजा मामला जगदलपुर का है, जहां युवा उत्सव का आयोजन किया गया था। राज्य सरकार के इस समारोह को आयोजित करने की जिम्मेदारी कलक्टर की थी क्योंकि मुख्य अतिथि के रूप में जिले के प्रभारी मंत्री मौजूद थे तथा युवा आयोग के अध्यक्ष समेत अन्य सदस्यों ने भी समारोह में शिरकत की। इसके लिए राज्य सरकार ने एक बड़ी राशि स्वीकृति की ताकि शानदार तरीके से युवाओं के इस आयोजन को सम्पन्न कराया जा सके। लेकिन कलक्टर ने ऐसे इंतजाम किए कि समारोह में शामिल होने वाले प्रतिभिागियों से लेकर आमंत्रित मेहमान तक नाराज हो गए।

अगर एक नौकरशाह की व्यवस्थाओं की बारीकी से समीक्षा की जाए तो बस्तर जिला पंचायत अध्यक्ष जबीता मण्डावी का यह बयान ही काफी है, जिसमें उन्होंने कहा है कि इस प्रकार के अव्यवस्थित आयोजनों से बस्तर की देश-प्रदेश में बदनामी होती है। युवा उत्सव में शामिल होने वाली छात्राओं के लिए शौचालयों की व्यवस्था न कर पाना कलक्टर की सबसे बड़ी और अक्षम्य गलती है क्योंकि इस समय पूरे देश में स्वच्छता अभियान चलाया जा रहा है और प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री इसमें निजी तौर पर रुचि ले रहे हैं।

चोरी और सीना जोरी की तर्ज पर बस्तर कलक्टर का यह कहना कि उनकी बेटी की शादी नहीं है, जिसमें वे पूरी व्यवस्था करें, उनकी अपरिपक्वता को दर्शाता है। दरअसल बस्तर की तासीर ही कुछ ऐसी है कि वहां के कलक्टर बनने के बाद हर नौकरशाह अपने को सुपर हीरो समझने लगता है। पिछले कलक्टर ने तो प्रधानमंत्री की अगवानी करते समय आंखों पर काले शीशे वाला चश्मा पहनकर सभी मर्यादाओं को ही लांघ दिया था। वर्तमान कलक्टर उनसे एक कदम आगे हैं। स्वास्थ्य सम्बंधी समस्याओं को लेकर उनके पास जाने वाले हर व्यक्ति को निराश लौटना पड़ता है क्योंकि हर बार उनका यही जवाब होता है कि इसमें वे क्या कर सकते हैं।

राज्य सरकार की भी नीति समझ में नहीं आती है। बस्तर के रास्ते वह सरकार बनाने की तैयारी करती है लेकिन कमिश्नर और कल्कटर के रूप में वहां ऐसे नौकरशाह पदस्थ किए जाते हैं, जिन्हें कम से कम तेज-तर्रार अफसर नहीं कह सकते हैं। जगदलपुर में इस समय कमिश्नर और कलक्टर की कुर्सी प्रमोटिव आईएएस के पास है, जो अपनी शासकीय सेवा की संझा बेला पर खड़े हैं. उनकी कार्यशैली में वह करंट नहीं है, जो किसी आईएएस अफसर में होनी चाहिए। उनकी बातों को मंत्रालय में बैठे अफसर सुनते ही नहीं हैं। ऐसी स्थिति में बस्तर में होने वाले सरकारी समारोहों में वे केवल औपचारिकताएं पूरी करते हैं क्योंकि वे अच्छी तरह से जानते हैं कि सरकार नाराज हुई तो बस्तर से हटाकर रायपुर ही ले जाएगी। भले ही मलाईदार कुर्सी न मिले परंतु राजधानी में बंगला, गाड़ी और अर्दली को जरूर मिलेगा। शायद इसी वजह से बस्तर में पदस्थ अफसरों का व्यवहार जनविरोधी होता है। इसके बाद राज्य सरकार बस्तर को लेकर भले की कितने भी सुनहरे सपने देख ले, उन सपनों को सच करने के लिए जो काम किया जाना चाहिए, वह बस्तर में पदस्थ नौकरशाह तो कम से कम नहीं कर रहे हैं।

चोखेलाल
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