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नवरात्रि विशेष : दंतेश्वरी शक्तिपीठ में पशुओं की नहीं, बल्कि कुम्हड़े की दी जाती है बलि 

बी महेश राव@जगदलपुर। बस्तर की आदिशक्ति मां दंतेश्वरी मंदिर के भीतर जीव बलि की कुप्रथा नहीं है, लेकिन विशेष पूजा के दौरान सात्विक बलि की परंपरा है। नवरात्र में पंचमी की रात गुप्त पूजा के दौरान रखिया कुम्हड़े की बलि अवश्य दी जाती है। यह पूजा-अनुष्ठान मंदिर के मुख्य पुजारी अपने करीबी सहयोगियों की मौजूदगी में आधी रात को संपन्न करते हैं। इस समय अन्य लोगों का मंदिर प्रवेश वर्जित होता होता है।

विशिष्ट लोग ग्रहण हैं प्रसाद 

पंचमी की रात मंदिर में विशेष पूजा-अनुष्ठान होता है। देवी मां का  दुध-दही, शहद आदि से अभिषेक के बाद विशेष पुष्प और वस्त्रों से श्रृंगार किया जाता है। मांईजी के समक्ष सात्विक बलि के रुप में रखिया कुम्हड़ा काटा जाता है। इस दौरान मंदिर और गर्भगृह के कपाट बंद रखे जाते हैं। बताया जाता है कि इस अनुष्ठान के प्रसाद को भी पुजारी और विशिष्ट लोग ही ग्रहण करते हैं।

 

अठारहवीं शताब्दी से बलि पर लगी रोक

इधर किवदंतियों के अनुसार दंतेश्वरी मंदिर में सालों पहले नर और पशु बलि की प्रथा थी, लेकिन अठारहवीं सदी में ही इसमें रोक लगा दी गई। अब मंदिर के गर्भगृह में किसी भी जीव की बलि नहीं दी जाती। लेकिन मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु मंदिर के पीछे परिसर में अपनी मनोकामना के अनुसार क्रियाएं संपादित करते हैं।

गोपनीय होती है बलि 

मंदिर के मुख्य पुजारी हरेंद्र नाथ जिया के मुताबिक दंतेश्वरी मंदिर में नवरात्र पंचमी की रात गुप्त पूजा होती है। इस दौरान सात्विक बलि के रुप में रखिया कुम्हड़ा काटा जाता है। यह अनुष्ठान गोपनीय होता है और बाहरी लोगों को शामिल नहीं किया जाता।

 

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