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राजनैतिक से बड़े नैतिक कवि थे मुक्तिबोध

रायपुर: रजा फाउंडेशन एवं मुक्तिबोध परिवार के तत्वावधान में गजानन माधव मुक्तिबोध जन्मशती के अवसर पर वृंदावन हॉल में अंधेरे में अंत:करण विषय पर दो दिवसीय आयोजन प्रारंभ हुआ। अपने आरंभिक वक्तव्य में अशोक वाजपेयी ने मुक्तिबोध की जन्मशती के अवसर पर उनकी प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए कहा कि जिस अंधेरे में की कल्पना मुक्तिबोध ने की थी वो आज ज्यादा घना है। कार्यक्रम की रुपरेखा रखते हुए उन्होंने विभिन्न चर्चा सत्रों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि सच्चाई को ताडऩा मुक्बिोध की फितरत में शामिल था, उन्होंने वर्तमान स्थितियों में मुक्तिबोध की चिंताओं का जिक्र करते हुए रजा फाउंडेशन के इस आयोजन की महत्ता प्रतिपादित की। इसी क्रम में कृष्णा सोबती द्वारा लिखित और राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक मुक्तिबोध एक व्यक्तित्व – सही की तलाश में… का विमोचन सर्वश्री विनोद कुमार शुक्ल, प्रभात त्रिपाठी, विष्णु खरे, नंदकिशोर आचार्य, रमेश मुक्तिबोध तथा सविता सिंह ने किया।

प्रथम चर्चा सत्र का विषय था – सत्-चित्-वेदना और विवेकवेदना : प्रथम वक्ता के रुप में राजेंद्र कुमार ने कहा कि मुक्तिबोध के यहां जगत और जीवन के स्वरुप के लिए सत-चित वेदना अनिवार्य तत्व नहीं है। मुक्तिबोध आनंद की जगह वेदना को स्थापित कर मानवबोध को सशस्त करने में भरोसा करते हैं। परम सत्य से जीवन सत्य की ओर आने का यह उनका तरीका था। जीवन सत्य परिवर्तनशील रहकर भी गति का एहसास दे सकता है, यह वास्तविक आनंद हैं। लेखक टालस्टॉय तथा महादेव वर्मा के प्रति उनका आकर्षण स्वयं उन्होंने उल्लेखित किया हैं। दूसरे वक्ता के रुप में नंदकिशोर आचार्य ने कहा कि भावना भी जीवन का ज्ञान प्राप्त करने का साधन है। किसी वाद या प्रभाव के रुप में इसे न देखा जाए। संवेदनात्मक ज्ञान या ज्ञानात्मक संवेदना के संदर्भ में उनकी वेदना का जिक्र उन्होंने किया। उनका मत था कि पक्षधरता है तो अंतरआत्मा का बोध अनिवार्य हैं। मुक्तिबोध की जन-जन में आस्था हैं किन्तु यह लोकतंत्र तक ही सीमित नहीं है, वे संपूर्ण मानव मूल्यों को इस संदर्भ में देखते हैं। विवेक वेदना पर भी उन्होंने सवाल उठाए। चर्चा सत्र को आगे बढ़ाते हुए शम्भुनाथ ने कहा कि अंधेरे में अंत:करण की खोज तभी संभव है जब रचनाकार सजग हो। मुक्तिबोध विश्व संस्कृति के विच्छिन्न कवि नहीं बल्कि विश्व संस्कृति के भीतर के नागरिक हैं। व्यापक समकालीनता से अलग कर उन्हें नहीं देखा जा सकता। उन्होंने अध्यात्म की जगह लोक कथाओं के बिम्ब उठाए। कई तरह के सौंदर्य बोध को वे चुनौती देते हैं।  छायावाद से वे मुठभेड़ भी करते हैं जिसमें उन्हें बावड़ी अच्छी लगती है। सभ्यता के आत्मघात की पीड़ा को वे रेखांकित करते हैं। वर्तमान संदर्भों में उन्होंने समझदारी के साथ ईमानदारी को अनिवार्य बताया।
चर्चा सत्र को आगे बढ़ाते हुए पंकज चतुर्वेदी ने कहा कि वंचित और दु:खी समाज से जुडऩा मुक्तिबोध का स्वभाव था। विष को अन्न मानने की उनकी कल्पना, विक्षिप्तता की कामना को वेदना उनकी रचना में व्यापक स्तर पर ध्वनित होती है। मुक्तिबोध को यह सभ्यता जंगल की तरह महसूस होती थी। वे खुद के लोगों के प्रति भी संदिग्ध नजरिया रखते थे। उनकी कविता खुले अंतों की कविता हैं। इसी क्रम में सदानंद शाही ने कहा कि विवेक, मुक्तिबोध की कविता का केंद्र हैं जो संकट में हैं। समाज से यह गायब होता जा रहा है। इसे जागृत करने की चिंता उनकी कविता में वक्त होती है। भक्ति के संदर्भ में वे मानव को केंद्र में रखकर सद्चित वेदना की कल्पना को परिभाषित करते हैं। वे सत्य की चिंता, प्रतिष्ठा के लिए भी संघर्ष करते हैं। कबीर की तरह मुक्तिबोध आदमकद मानव बनाना चाहते हैं। वर्तमान संदर्भ में सत्ता और सत्य के संबंध में मुक्तिबोध की कविता आइने की तरह काम करती हैं। कुमार प्रशांत ने कहा कि कोई भी रचना स्वयं में वेदना हैं, फिर वह किसी भी रुप में हो। सद्चित आनंद से आनंद को हटाकर मुक्तिबोध ने इसे वेदना कहा, इसी में उनका आनंद हैं। अभी व्यक्ति की अकुलाहट की वेदना से रचना शुद्ध होती है। निर्दोष चित्त में उठी छटपटाहट ही सच्ची वेदना है। मुक्तिबोध की साधना भी जटिल रास्तों से गुजरती है। खुद से उलझना उनका धर्म है। इस मायने में वे गांधी के समकक्ष नजर आते हैं। अंधेरे में मुक्तिबोध की देखने की व्याकुलता उस अंधेरे को भेदने की, सच्चाई को पाने की ताकत हैं। मुक्तिबोध की पूरी रचना का सत्य यही है। अंतिम वक्ता के रुप में दुर्गाप्रसाद गुप्त ने कहा कि संघर्षरत रहते हुए, निम्न मध्य वर्ग के साथ समझौता न करना यह सत्वेदना मुक्तिबोध ने कायम रखी। आज मध्य वर्ग का चरित्र दो शतकों बाद भी बहस के केंद्र में है। वेदना के तहत कविता, कहानी, चिंतन के स्तर पर उनके दौर के मध्य वर्ग में ईमानदारी परिलक्षित होती है। आत्म संघर्ष के तत्कालीन दौर में भी वे आत्म पीड़ा का रोना नहीं रोते। उनकी संचित वेदना, कविता के साथ चिंतन, जीवन दृष्टि हर जगह दिखाई देती है। आज के दौर में यह अंधेरा और ज्यादा गहराया है इसलिए मुक्तिबोध की प्रासंगिगता आज कहीं ज्यादा है। परिचर्चा का संचालन जयप्रकाश ने किया।
मुक्तिबोध ने माक्र्सवादी निष्ठा में अध्यात्मिकता जोड़ी : वाजपेयी
मुक्तिबोध हिन्दी साहित्य के सबसे बड़े आत्माभिवादी कवि हैं। इसके साथ ही वे नैतिक कवि भी हैं लेकिन संशय ग्रस्त हैं। उनकी रचनाओं में एक नहीं अनेक जगह नैतिकता और आध्यात्मिकता के बिंब मिलते हैं। वे स्वयं को इस समाज के पतन के लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका स्वयं को जिम्मेदार मानना सबसे बड़ी नैतिकता है। माक्र्सवादियों में मुक्तिबोध अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी दृष्टि माक्र्सवाद से परे जाती है। उन्होंने माक्र्सवादी निष्ठा में आध्यात्मिकता की बढ़त दी है।
देश के मूर्धन्य कवि और आलोचक अशोक वाजपेयी नेे कहा मुक्तिबोध अंधेरी मनुष्यता विरोधी शक्तियों की पूरी भयावहता के सच को पहचानते थे। उन्होंने बहुत पहले ही समाज के इस हश्र को समझ लिया था। इसीलिए उनकी कविता आज यथार्थ लगती है। बिना प्रेम और विरह पर लिखे वे हिंदी साहित्य के एक मात्र महान कवि हैं जिनका कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। उन्होंने कहा कि मुक्तिबोध गोत्रहीन पूर्वजहीन कविता के कवि हैं। वाजपेयी ने मुक्तिबोध और गांधी की तुलना करते हुए कहा कि जैसे गांधी के नाम पर बहुत आयोजन होते हैं लेकिन उनकी राह पर कोई नहीं चलता ऐसे ही मुक्तिबोध पर चर्चा तो बहुत होती है लेकिन उनकी तरह कोई दूसरा नहीं लिखता। वास्तव में मुक्तिबोध की तरह कोई दूसरा अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठा पाता है। न तो इतिहास में ऐसा कवि हुआ है और न आने वाले दस बीस साल तक कोई संभावना बनते दिख रही है।
कार्यक्रम में भाग लेने वाले साहित्यकारों में पुरुषोत्तम अग्रवाल, सुधीर चंद्रा, अपूर्वानंद, लीलाधर मंडलोई, नरेश सक्सेना, ओम निश्चल, विष्णु नागर, सविता सिंह, हेमलता माहेश्वर, श्रीकुमार प्रशांत, राजेन्द्र कुमार, वैभव सिंह, दुर्गाप्रसाद गुप्ता, विष्णु खरे, आशीष त्रिपाठी, नंद किशोर आचार्य, सदानंद साही, अरुण कमल, रेवती रमण, ललित सुरजन, विनोद कुमार शुक्ल आदि शामिल हैं।

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