Chhattisgarh Dharm Raipur

शरद पूर्णिमा के चांद को खुली आंखों से नहीं, खौलते दूध से भरे बर्तन में देखें

सनातन हिन्दू धर्म में आश्विन मास की पूर्णिमा तिथि को शरद पूर्णिमा मनायी जाती है। धर्म ग्रन्थो के अनुसार इस दिन माता लक्ष्मी पृथ्वी पर भ्रमण करके ये देखने आती है कि “कौन जाग रहा” है इसलिये इसे “”कोजागरी पूर्णिमा”” के नाम से भी जाना जाता है।

पौरणिक दृष्टि से शरद पूर्णिमा का सवोत्तम चित्रण श्रीमद् भागवत महापुराण के दशम स्कन्ध में देखने में मिलता है । इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने महारास किया था इसलिये “”रास पूर्णिमा”” भी कहते है।

रास शब्द का शाब्दिक अर्थ है –
रसौ वै सः
अर्थात –
एक रस अनेक रसों में होकर अनन्त रस का रसास्वादन करें , उसे रास कहा जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह समय वर्ष का मध्य काल होता है तथा शरद पूर्णिमा का पूर्ण चन्द्रमा सम्पूर्ण वर्ष भर में इसी दिन 16 कलाओं का होता है। तथा अश्विनी नक्षत्र से संयोग करता है । जिसके स्वामी देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार है, जिन्होंने च्यवन ऋषि को दीर्घायु जीवन प्रदान किया था।
इस दिन चाँदनी में अमृत का अंश बरसता है इसलिये खीर बनाकर रात भर खुले आँगन में रखा जाता है तथा सुबह उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
इस दिन की चाँदनी के औषधीय महत्व का वर्णन मिलता है इसलिये अनेक असाध्य रोगो की दवाएं इस खीर में मिलाकर खिलाई जाती है। औषधी विज्ञान के समस्त ग्रन्थो के अनुसार जितनी भी प्राकृतिक औषधियां,जड़ी-बूटियां है उनमें शरद पूर्णिमा के बाद आरोग्यदायी तत्वों की वृद्धि होती है इसलिये इन जड़ी बूटियों को शरद पूर्णिमा के बाद ही
संग्रहीत करना चाहिए।

शरद पूर्णिमा का अपनी श्रेष्ठ सनातन संस्कृति में निम्न कारणों से एक विशेष स्थान है:-

वर्षभर में बारह(१२) पूर्णिमा होती है लेकिन सिर्फ शरद पूर्णिमा पर ही अमृतवर्षा होती है। यह एक मान्यता मात्र नहीं है, वरन आध्यात्मिक अवस्था की एक खगोलीय घटना है. शरद पूर्णिमा की रात्रि पर चन्द्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है एवं वह अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण रहता है। इस रात्रि चन्द्रमा का ओज सबसे तेजवान एवं उर्जावान होता है, इसके साथ ही शीतऋतु का प्रारंभ होता है। शीतऋतु में जठराग्नि तेज हो जाती है और मानव शरीर स्वस्थ्यता से परिपूर्ण होता है।

अनेक बंधुगण इस पूर्णिमा पर दूध और चावल मिश्रित खीर पर चन्द्रमा की किरणों को गिरने के लिये रख देते है. चन्द्रमा तत्व एवं दूध पदार्थ समान उर्जा धर्म होने के कारण दूध अपने में चन्द्रमा की किरणों को अवशोषित कर लेता है. इस तरह मान्यता के अनुसार उसमे अमृतवर्षा हो जाती है और खीर को खाकर अमृतपान का संस्कार पूर्ण करते है.

शरद पूर्णिमा पर चंद्रदर्शन व देवी लक्ष्मी की उपासना का महत्व है. लक्ष्मी कृपा देने वाले शरद पूर्णिमा के चंद्रमा की दो खासियत है- रोशनी और शीतलता, रोशनी यानी प्रकाश ज्ञान स्वरूप माना जाता है. संकेत है कि व्यावहारिक जीवन में ज्यादा से ज्यादा ज्ञान अर्जन ही दक्ष, कुशल व माहिर बनाता है, यानी ज्ञान, गुणी बनने के साथ धनी बनने की राह आसान बनाता है. दूधिया रोशनी के साथ चंद्रमा की एक ओर विशेषता – शीतलता, यानी ठंडक यही संकेत करती है कि स्वभाव से शांत, वाणी से मधुर बने व व्यवहार में विनम्रता को अपनाए. प्रतीकात्कात्मक रूप से लक्ष्मी का आनंद स्वरूप भगवान विष्णु का संग भी इस बात की ओर इशारा है. क्योंकि शांत, सरल, सौम्य, सात्विक और सहज रहने से न केवल तन व मन भी निरोगी और ऊर्जावान रहता है बल्कि चंद्रमा की शीतलता की तरह दूसरों को भी प्रेम, सेवा, परोपकार व दया के रूप में बेहद राहत दी जा सकती है. ये गुण ही जीवन में सफल और वैभवशाली बनने के सूत्र हैं.
शरद पूर्णिमा की चांदनी पर नजर डालकर इन दो बातो को संकल्प के साथ जीवन में उतार लिया जाए तो धन ही नहीं तमाम सांसारिक सुखों को पाना भी बेहद आसान हो सकता है. कुछ प्रांतों में खीर बनाकर रात भर खुले आसमान के नीचे रखकर सुबह खाते हैं. इसके पीछे भी यही मान्यता है कि चांद से अमृतवर्षा होती है.

इसे रास पूर्णिमा भी कहते हैं क्योंकि इसी दिन श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ महारास की शुरूआत की थी.

बंगाल में शरद पूर्णिमा को कोजागोरी लक्ष्मी पूजा कहते हैं.

महाराष्ट्र में कोजागरी पूजा कहते हैं और गुजरात में शरद पूनम.

आइए इसके कुछ और रस्मों पर नजर डालें-
भगवान को खीर चढ़ाना ,
पूर्णिमा की चांद को खुली आंखों से नहीं देखना. खौलते दूध से भरे बर्तन में चांद देखते हैं
चन्द्रमा की रोशनी में सूई में धागा डालना ,
खीर,पोहा,मिठाई रात भर चांद के नीचे रखना.
शरद पूर्णिमा का चांद बदलते मौसम अर्थात मानसून के अंत का भी प्रतीक है.
इस दिन चांद धरती के सबसे निकट होता है इसलिए शरीर और मन दोनों को शीतलता प्रदान करता है. इसका चिकित्सकीय महत्व भी है जो स्वास्थ्य के लिए अच्छा है. प्रत्येक प्रांत में शरद पूर्णिमा का कुछ न कुछ महत्व अवश्य है।

भारत एक कृषि प्रधान देश है तथा यहाँ की प्रमुख खाद्य फसले है गेहूं और चावल (धान). तथा छ: ऋतूये है:- बसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, शिशिर तथा हेमन्त. इनमे सबसे मनमोहक मानी जाती है बसन्त और शरद ।
गेहू की फसल पकने के समय बसन्त ऋतु में होली मनायी जाती है उसी प्रकार धान की फसल पकने के समय शरद रितु में शरद पूर्णिमा और दीपावली मनायी जाती है. होली पर गेहूं की बालिया भुन कर प्रसाद बनाया जाता है और शरद पूर्णिमा पर नये चावल की खीर का प्रसाद बनाया जाता है.
शरद पूर्णिमा को आदि कवि भगवान वाल्मीकि का जन्म दिवस मनाया जाता है. भगवान वाल्मीकि ने संस्कृत भाषा में रामायण की रचना की जो संसार का पहला लोककाव्य है।

इस दिन प्रातः काल अपने आराध्य देव व लक्ष्मी माता को सुंदर वस्त्राभूषणों से सुशोभित कर आसन पर विराजमान करें। फिर गंध ,अक्षत, धुप, दीप, नैवैद्य, ताम्बूल, दक्षिणा आदि से पूजा करना चाहिये । पूर्णिमा व्रत करके कहानी सुनना चाहिए।
लक्ष्मी माता की प्रतिमा या चित्र के सामने देशी घी का अखण्ड दीपक रात भर जला कर रखें । तथा अधिकाधिक संख्या में लक्ष्मी मन्त्र का जप व श्रीसूक्त का पाठ करें।
लक्ष्मी माता के मंत्रो को कमलगट्टे के माला से जप करने से आर्थिक समस्या दूर होती है।
इस तरह पूजन,स्मरण,संकीर्तन तथा रात्रि जागरण करने से लक्ष्मी माता प्रसन्न होती है तथा सुख-समृद्धि का वरदान देती है।

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के प्राचीन श्री महामाया देवी मन्दिर पुरानी बस्ती में हर वर्ष की तरह इस बार भी –
दिनांक 5/10/2017
दिन गुरूवार को
रात्रि 10 बजे
शरद पूर्णिमा उत्सव मनाया जायेगा। जिसमें माँ महामाया देवी व परिसर में प्रतिष्ठत सभी श्री विग्रहों का भव्य सिंगार कर आरती उतारी जायेगी। तथा मन्दिर परिसर में ही चाँदनी रात में , खुले आसमान के नीचे खीर बनाकर ,भोग लगाने के बाद उपस्थित श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरण किया जायेगा।
जय माता की।

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