पत्रकारों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल: हत्या से आगजनी तक, जांच के लंबे इंतजार में दबती जा रही आवाज?

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सुशील पाठक से उमेश राजपूत तक और अब हेमंत तिवारी की कार आगजनी—हर घटना के बाद एक ही सवाल, आखिर पत्रकारों के मामलों में जांच का अंत कब होगा?

 

परमेश्वर राजपूत,छुरा/गरियाबंद : पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। पत्रकार सत्ता, प्रशासन और व्यवस्था से सवाल पूछता है, आम लोगों की समस्याओं को सामने लाता है और उन मुद्दों को समाज तक पहुंचाता है, जिन्हें कई बार व्यवस्था नजरअंदाज कर देती है। लेकिन जब इसी पत्रकार पर हमला होता है, उसकी हत्या होती है या उसे डराने की कोशिश का आरोप सामने आता है, तब सबसे बड़ा सवाल केवल अपराध का नहीं, बल्कि जांच, जवाबदेही और न्याय की गति का भी बन जाता है।छत्तीसगढ़ में पत्रकारों से जुड़ी कुछ घटनाएं आज भी इस सवाल को जीवित रखे हुए हैं। बिलासपुर के पत्रकार सुशील पाठक की दिसंबर 2010 में गोली मारकर हत्या, इसके कुछ ही समय बाद छुरा क्षेत्र में 23 जनवरी 2011 को पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या, और अब छुरा क्षेत्र के तौरेंगा में पत्रकार हेमंत तिवारी के घर के सामने उनकी कार में आग लगाए जाने की घटना ने एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा और पुलिस जांच पर चर्चा तेज कर दी है।

सुशील पाठक हत्याकांड: जांच सीबीआई तक पहुंची
20 दिसंबर 2010 की रात बिलासपुर में दैनिक भास्कर से जुड़े पत्रकार सुशील पाठक की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। शुरुआती पुलिस जांच में हमलावरों की पहचान नहीं हो सकी। बाद में मामला केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई को सौंपा गया। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में भी इस मामले की जांच सीबीआई को स्थानांतरित किए जाने का उल्लेख है।घटना के वर्षों बाद भी यह मामला पत्रकारों की सुरक्षा और लंबी जांच प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े करता रहा है। सवाल यह है कि जब किसी पत्रकार की हत्या जैसे गंभीर मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी तक पहुंच जाए, तो भी न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों हो जाती है?

उमेश राजपूत हत्याकांड: 15 साल बाद भी सवाल कायम
23 जनवरी 2011 की रात छुरा क्षेत्र में नई दुनिया के पत्रकार उमेश राजपूत की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। पुलिस के अनुसार दो नकाबपोश हमलावरों ने उनके घर के बाहर उन्हें निशाना बनाया था। घटनास्थल के पास धमकी भरी पर्ची मिलने की बात भी सामने आई थी। उस समय उनके परिवार ने पूर्व में मिली धमकियों का भी उल्लेख किया था। हालांकि हत्या का वास्तविक उद्देश्य क्या था, इस पर विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग आशंकाएं और जांच के कोण सामने आए।मामले की जांच बाद में सीबीआई को सौंपने का आदेश हाईकोर्ट ने दिया था। अदालत के रिकॉर्ड में सीबीआई को मामले की जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दर्ज है।लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक गंभीर सवाल छोड़ दिया—यदि स्थानीय पुलिस से लेकर केंद्रीय जांच एजेंसी तक मामला पहुंच जाए और वर्षों तक न्याय का इंतजार जारी रहे, तो आम नागरिक और पत्रकार आखिर किस व्यवस्था पर भरोसा करें?

अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संगठन सीपीजे ने भी उमेश राजपूत मामले में वर्षों बाद तक गिरफ्तारी नहीं होने और महत्वपूर्ण साक्ष्यों के गायब होने संबंधी परिजनों द्वारा लगाए गए दावों का उल्लेख किया था। ये दावे संबंधित पक्षों के हैं और इनके आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन वे जांच की पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों को जरूर सामने रखते हैं।

अब हेमंत तिवारी की कार आगजनी ने फिर खड़े किए सवाल
इसी बीच छुरा क्षेत्र के तौरेंगा में पत्रकार हेमंत तिवारी के घर के सामने खड़ी कार को आग के हवाले किए जाने की घटना ने पत्रकार समुदाय की चिंता बढ़ाई है। घटना को लेकर पुलिस जांच जारी है और फिलहाल यह स्पष्ट होना बाकी है कि आग किसने और किस उद्देश्य से लगाई।यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू होता है—क्या यह महज आपराधिक घटना है, व्यक्तिगत विवाद का परिणाम है या पत्रकारिता से जुड़े किसी कारण की भी जांच की आवश्यकता है? इसका जवाब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ सकता है।लेकिन पत्रकार समुदाय की चिंता इसलिए भी स्वाभाविक है क्योंकि जब किसी पत्रकार के घर के सामने उसकी संपत्ति को निशाना बनाया जाता है, तो वह घटना केवल नुकसान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सुरक्षा की भावना और स्वतंत्र पत्रकारिता के वातावरण पर भी असर डालती है।

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क्या पत्रकारों को डराने की घटनाओं की गंभीरता से जांच होती है?
पत्रकारों पर हमले के मामलों में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच केवल घटना को अंजाम देने वाले व्यक्ति तक सीमित न रहे, बल्कि अपराध के पीछे के कारण और संभावित उद्देश्य की भी निष्पक्ष जांच हो।यदि किसी पत्रकार को उसके काम के कारण धमकी दी गई हो, तो उस धमकी और बाद की घटना के बीच संबंध की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। वहीं यदि घटना का कारण व्यक्तिगत या अन्य आपराधिक विवाद हो, तो जांच एजेंसियों को उसी तथ्य को स्पष्ट रूप से सामने रखना चाहिए।बिना जांच के किसी प्रभावशाली व्यक्ति, राजनीतिक व्यक्ति या संगठन की भूमिका मान लेना भी उचित नहीं है और किसी संभावित कोण को केवल इसलिए नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है क्योंकि पीड़ित पत्रकार है।

सवाल सिर्फ एक पत्रकार का नहीं, लोकतांत्रिक व्यवस्था का है
पत्रकार किसी राजनीतिक दल का प्रवक्ता नहीं होता। उसका मूल दायित्व जनता के सवालों को सामने लाना और तथ्यों को समाज तक पहुंचाना है। ऐसे में किसी पत्रकार की हत्या, धमकी या संपत्ति को निशाना बनाए जाने की घटना का असर केवल उस व्यक्ति और उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता।
यह दूसरे पत्रकारों के लिए भी एक संदेश बन सकता है—क्या वे निर्भीक होकर संवेदनशील मुद्दों पर लिखें या संभावित खतरे को देखते हुए पीछे हटें?
यही वजह है कि पत्रकारों से जुड़े आपराधिक मामलों में त्वरित, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच की मांग केवल पत्रकार संगठनों की मांग नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा व्यापक विषय है।

‘असफलता’ का सवाल या जवाबदेही का सवाल?
इन घटनाओं को देखते हुए यह कहना कि पूरा प्रशासन, सरकार या न्यायपालिका निश्चित रूप से असफल रही है, एक व्यापक निष्कर्ष होगा। अलग-अलग मामलों की जांच, न्यायिक प्रक्रिया और उपलब्ध साक्ष्यों की स्थिति अलग हो सकती है। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि पत्रकारों से जुड़े गंभीर अपराधों में जांच और न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों होती है और पीड़ित परिवारों को वर्षों तक इंतजार क्यों करना पड़ता है?
लोकतंत्र में जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता केवल अपराधी की गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि इस बात से भी तय होती है कि जांच कितनी निष्पक्ष, वैज्ञानिक,पारदर्शी और समयबद्ध रही। अब जरूरत सवालों के जवाब की है सुशील पाठक की हत्या, उमेश राजपूत की हत्या और हेमंत तिवारी की कार आगजनी—तीनों घटनाओं की परिस्थितियां अलग हैं और इनके बीच सीधा संबंध स्थापित करना उचित नहीं होगा। लेकिन तीनों घटनाएं पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर एक साझा सार्वजनिक प्रश्न जरूर सामने रखती हैं।

क्या पत्रकारों को निशाना बनाने वाली घटनाओं की जांच के लिए अलग और प्रभावी व्यवस्था होनी चाहिए?
क्या पत्रकारों को मिली धमकियों को पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज कर उनकी गंभीरता से निगरानी होनी चाहिए?
क्या लंबित मामलों की समय-समय पर उच्चस्तरीय समीक्षा होनी चाहिए?और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी पत्रकार के खिलाफ अपराध को केवल एक सामान्य आपराधिक घटना मानने के बजाय उसके पेशे और प्रकाशित खबरों से जुड़े संभावित कोण की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए?इन सवालों के जवाब केवल पत्रकार जगत ही नहीं, बल्कि शासन, प्रशासन, पुलिस, जांच एजेंसियों और समाज—सभी को तलाशने होंगे।क्योंकि जब सवाल पूछने वाली कलम असुरक्षित महसूस करती है, तो उसका असर केवल एक पत्रकार पर नहीं, बल्कि लोकतंत्र में जनता के सवाल पूछने के अधिकार पर भी पड़ता है।

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