बिलासपुर : शादीशुदा पुरुष के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रहने और घरेलू हिंसा कानून के तहत राहत मांगने से जुड़े मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला को पहले से मालूम है कि संबंधित पुरुष की पत्नी जीवित है और उसका विवाह कायम है, तो परिस्थितियों के आधार पर ऐसे रिश्ते को हर मामले में ‘विवाह की प्रकृति वाला संबंध’ नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की सिंगल बेंच ने की। कोर्ट ने महिला की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा।
मंदिर में शादी और लिव-इन का दावा
सूरजपुर निवासी महिला ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बताया था कि उसने उग्रनारायण सिंह के साथ मंदिर में शादी की थी। इसके बाद दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में साथ रहे।
महिला का तर्क था कि दोनों लंबे समय तक साथ रहे हैं, इसलिए उनके बीच का रिश्ता घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 की धारा 2(एफ) में बताए गए ‘डोमेस्टिक रिलेशनशिप’ के दायरे में आता है।
वहीं, पुरुष की ओर से इस दावे का विरोध किया गया।
पुरुष की पहले से थी शादी
हाईकोर्ट के समक्ष पुरुष की ओर से बताया गया कि उसकी शादी वर्ष 2000 में अनंत कुमारी से हो चुकी थी और इस विवाह से दो बच्चे भी हैं। उसका दावा था कि महिला को उसकी शादी और बच्चों के बारे में पहले से जानकारी थी।
दलील दी गई कि पहली वैध शादी के रहते दूसरी शादी को कानूनी मान्यता नहीं दी जा सकती। साथ ही दोनों के बीच पारिवारिक रिश्ता भी होने की बात कही गई।
निचली अदालत से भी नहीं मिली राहत
महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत राहत मांगते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, सूरजपुर के समक्ष आवेदन पेश किया था।
30 मार्च 2024 को मजिस्ट्रेट ने आवेदन खारिज कर दिया। इसके बाद महिला ने अपील की, लेकिन द्वितीय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सूरजपुर ने 8 दिसंबर 2025 को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
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इसके बाद महिला ने हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर की।
ममेरे रिश्ते को लेकर भी कोर्ट की टिप्पणी
हाईकोर्ट ने मामले में यह भी पाया कि महिला और पुरुष ममेरे रिश्ते में थे। अदालत ने कहा कि ऐसे रिश्तों में भाई-बहन के बच्चों के बीच विवाह प्रतिबंधित संबंध की श्रेणी में आता है।
कोर्ट के अनुसार, ऐसा विवाह तभी मान्य हो सकता है जब संबंधित पक्षों पर लागू कोई वैध प्रथा या रूढ़ि इस तरह के विवाह की अनुमति देती हो। इस मामले में ऐसी किसी मान्य प्रथा को साबित नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने याचिका की खारिज
कोर्ट ने परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर उपलब्ध तथ्यों को देखते हुए निचली अदालतों के आदेशों में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही महिला की क्रिमिनल रिवीजन याचिका खारिज कर दी गई।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी रिश्ते को घरेलू हिंसा कानून के तहत ‘विवाह की प्रकृति वाला संबंध’ मानने के लिए केवल साथ रहना ही पर्याप्त नहीं है। मामले की परिस्थितियों और संबंधित कानूनी शर्तों को भी देखा जाना जरूरी है।




