पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का पर्व बेहद धूमधाम और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। खासकर कोलकाता में इस दौरान सजे पंडाल, भव्य प्रतिमाएं और धार्मिक आयोजन पूरे शहर को उत्सव के रंग में रंग देते हैं। बंगाल की दुर्गा पूजा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और सामाजिक एकजुटता का भी प्रतीक है।

इस उत्सव से जुड़ी कई परंपराएं लोगों का ध्यान आकर्षित करती हैं। इनमें से एक है दुर्गा प्रतिमा के निर्माण में कोलकाता के सोनागाछी क्षेत्र से लाई जाने वाली मिट्टी का इस्तेमाल। सोनागाछी को कोलकाता के प्रमुख रेड लाइट क्षेत्रों में गिना जाता है। इस मिट्टी को लोकपरंपरा में ‘पुण्य माटी’ कहा जाता है। आखिर इस परंपरा के पीछे क्या मान्यता है और इसे दुर्गा पूजा से कैसे जोड़ा जाता है? आइए जानते हैं।
दुर्गा प्रतिमा में सोनागाछी की मिट्टी क्यों मिलाई जाती है?
बंगाल की दुर्गा पूजा से जुड़ी लोकमान्यताओं के अनुसार, कुछ स्थानों पर देवी दुर्गा की प्रतिमा बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मिट्टी में सोनागाछी जैसे रेड लाइट क्षेत्र की मिट्टी भी मिलाई जाती है। इसे लेकर अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक व्याख्याएं प्रचलित हैं।
एक मान्यता के अनुसार, जब कोई व्यक्ति वेश्यालय में प्रवेश करता है, तो उसके पुण्य कर्म उस स्थान की दहलीज पर छूट जाते हैं। इसी विचार से वहां की मिट्टी को प्रतीकात्मक रूप से पवित्र माना जाता है। हालांकि, यह एक प्रचलित लोकमान्यता है; इसे किसी सर्वमान्य धार्मिक नियम या ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
इस परंपरा की एक अन्य व्याख्या सामाजिक समावेश से जुड़ी है। समाज में हाशिये पर रखे गए लोगों को भी धार्मिक परंपरा में स्थान देना और उनके प्रति भेदभावपूर्ण नजरिये पर सवाल उठाना इसके प्रतीकात्मक अर्थों में शामिल माना जाता है।
क्यों कहा जाता है सोनागाछी की मिट्टी को ‘पुण्य माटी’?
‘पुण्य माटी’ यानी पुण्य से जुड़ी मिट्टी। बंगाल की दुर्गा पूजा से संबंधित कुछ लोककथाओं में सोनागाछी की मिट्टी को इसी नाम से पुकारा जाता है। इसके पीछे प्रचलित धारणा यह है कि वेश्यालय की दहलीज पर व्यक्ति के पुण्य छूट जाते हैं और वहां की मिट्टी एक विशेष धार्मिक अर्थ ग्रहण कर लेती है।
कुछ मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि इस मिट्टी के बिना दुर्गा प्रतिमा का निर्माण अधूरा माना जाता है। हालांकि, यह धारणा सभी स्थानों और सभी मूर्तिकारों के लिए समान रूप से लागू हो, ऐसा जरूरी नहीं है। प्रतिमा निर्माण की विधियां स्थानीय परंपराओं और मूर्तिकारों की मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
कौन लाता है सोनागाछी से मिट्टी?
प्रचलित विवरणों के अनुसार, दुर्गा प्रतिमा बनाने वाले कुछ मूर्तिकार या पूजा से जुड़े लोग रेड लाइट क्षेत्र से मिट्टी एकत्र करते हैं। इस परंपरा को लेकर कई कहानियां सुनाई जाती हैं, लेकिन मिट्टी लाने की प्रक्रिया हर जगह एक जैसी हो, इसका कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है।
बंगाल में दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण एक पारंपरिक कला है। इसमें मिट्टी के चयन से लेकर प्रतिमा को आकार देने और देवी के नेत्र बनाने तक कई चरण शामिल होते हैं। सोनागाछी की मिट्टी से जुड़ी मान्यता इसी व्यापक सांस्कृतिक परंपरा का एक चर्चित हिस्सा है।
भगवान राम और वेश्या अंबालिका से जुड़ी कथा
इस परंपरा को लेकर एक लोककथा भगवान राम से भी जोड़ी जाती है। प्रचलित कहानी के अनुसार, रावण से युद्ध से पहले भगवान राम ने देवी दुर्गा की आराधना की थी। इसी कथा के एक रूप में वेश्या अंबालिका के घर की दहलीज से मिट्टी लेने का उल्लेख मिलता है।
हालांकि, इस कथा के ऐतिहासिक या प्राचीन ग्रंथों में प्रमाणित होने की पुष्टि के बिना इसे लोककथा के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस परंपरा से जुड़ी कहानियों के रूप भी भिन्न हो सकते हैं।
देवी की भक्त वेश्या से जुड़ी एक और लोककथा
एक अन्य प्रचलित कथा में एक ऐसी महिला का उल्लेख मिलता है, जिसे समाज तिरस्कार की दृष्टि से देखता था, लेकिन वह देवी दुर्गा की परम भक्त थी। मान्यता के अनुसार, देवी उसकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उनकी प्रतिमा के निर्माण में वेश्यालय की मिट्टी के इस्तेमाल की परंपरा से जुड़ा आशीर्वाद दिया।
इस कथा का भाव सामाजिक भेदभाव से परे भक्ति और मानवीय गरिमा को महत्व देने से जुड़ा है। हालांकि, इसे भी प्रमाणित ऐतिहासिक घटना के बजाय लोकपरंपरा के रूप में समझना चाहिए।
दुर्गा पूजा की यह परंपरा क्या संदेश देती है?
सोनागाछी की मिट्टी से जुड़ी परंपरा केवल धार्मिक जिज्ञासा का विषय नहीं है। इसकी एक सामाजिक व्याख्या यह भी है कि किसी व्यक्ति की गरिमा और मानवीय मूल्य का आकलन उसके पेशे या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।
बंगाल की दुर्गा पूजा अपनी भव्य प्रतिमाओं, कलात्मक पंडालों और विविध लोकपरंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। सोनागाछी की मिट्टी से जुड़ी मान्यता इसी सांस्कृतिक विरासत का एक चर्चित पहलू है, जिसके धार्मिक अर्थों और ऐतिहासिक आधार को समझते समय लोककथाओं तथा प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर करना जरूरी है।




