CHHATTISGARH.CO DATE 16/10/2020;- भारत में महिलाओं के साथ वर्क प्लेस पर भेदभाव जारी है। कंस्ट्रक्शन, कृषि और इन्फॉर्मल सेक्टर में मजदूरी और घरों में बाई का काम करने वाली महिलाएं आज भी यौन उत्पीड़न और अपशब्दों का सामना कर रही हैं। एक अध्ययन में पाया गया कि इनकी रोकथाम के लिए बने कानूनों का इस्तेमाल बहुत कम किया जा रहा है।

भारत के इन्फॉर्मल सेक्टर में लगभग 2 करोड़ महिलाएं काम कर रहीं हैं। ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से जिन महिलाओं का उत्पीड़न हो रहा है, उन्हें न्याय दिलाने के लिए या उसको रोकने के लिए राज्य सरकारें अच्छे से काम नहीं कर रहीं।

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, महिलाओं को ही इसके रोकथाम के लिए आवाज उठानी होगी। बहुत सी महिलाएं अपने साथ होने वाले उत्पीड़न को लेकर चुप रहती हैं, उन्हें भी इसका विरोध करना चाहिए और न्याय के लिए प्रयास करना चाहिए।

उत्पीड़न रोकने के लिए 2013 में कानून बनाया गया था

देश में वर्क प्लेस पर महिलाओं का यौन उत्‍पीड़न रोकने के लिए 2013 में कानून बनाया गया था। इसे पोश एक्ट (POSH Act) यानी प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट कहा जाता है।

ज्यादातर गरीब और पिछड़े तबके की महिलाएं हैं

ह्यूमन राइट्स वॉच की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्क-प्लेस पर जिन महिलाओं का उत्पीड़न हो रहा है, उनमें ज्यादातर गरीब और पिछड़े तबके की महिलाएं हैं। उत्पीड़न की शिकार महिलाओं की कई बार मौत हो जाती है।

गुजरात में मजदूरों का प्रतिनिधित्व करने वाली ट्रेड यूनियन लीडर मीना जादव कहती हैं, ‘‘भारत में काम करने वाली जगहों पर शारीरिक और यौन उत्पीड़न बहुत आम बात हो चुकी है। हमारी पीढ़ी में महिलाएं शिकायत नहीं करती थीं। अगर विक्टिम कम उम्र की है तो उसके शिकायत करने की उम्मीदें और भी कम हो जाती थीं, क्योंकि परिवार नहीं चाहता था कि इस तरह की कोई बात बाहर आए।”

कंपनी में 10 सदस्यों की कमेटी भी बनाने के हैं निर्देश

  • पोश एक्ट के तहत देश में हर संस्था या कंपनी को 10 सदस्यों की एक कमेटी बनाने की बाध्यता है। यह कमेटी उस जगह या कंपनी में काम कर रहीं महिलाओं की शारीरिक और यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं को सुनेगी।
  • कानून के मुताबिक कमेटी की हेड महिला ही होनी चाहिए। कमेटी के पास उतनी पावर होगी, जितनी सिविल कोर्ट के पास होती है। ये कमेटी विक्टिम का बयान ले सकती है, मामले से जुड़े सबूतों और गवाहों की जांच भी कर सकती है।
  • यदि कमेटी किसी को दोषी पाती है तो वह उचित कार्रवाई के लिए अदालत और पुलिस को सूचित कर सकती है। कमेटी दोषी के खिलाफ टर्मिनेशन जैसी कार्रवाई भी कर सकती है। लेकिन यह राज्य सरकारों के ऊपर है कि वह गरीब, अशिक्षित और पिछड़े तबके की महिलाओं को इस कानून और उससे जुड़े नियमों के बारे में बताए।

पुलिस के खराब व्यवहार के चलते महिलाएं रिपोर्ट नहीं करतीं

महिलाओं के सामने लिंगभेद की एक बड़ी समस्या है, जिसके चलते वे खुलकर बोल नही पातीं। इस वजह से कोर्ट में उनसे जुड़े मामले सालों-साल अटके रहते हैं और उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाता। साउथ एशिया में ह्यूमन राइट की निदेशक मीनाक्षी गांगुली कहती हैं, ‘‘भारत में पोश एक्ट बनाया ही इसलिए गया था, ताकि महिलाओं को कोर्ट का विकल्प मिल सके, लेकिन पुलिस के लापरवाह रवैये और खराब बर्ताव के चलते बहुत सी महिलाएं रिपोर्ट ही नहीं करना चाहतीं।”

इसके रोकथाम के लिए क्या करें

मीनाक्षी गांगुली कहती हैं कि महिलाएं किसी के भरोसे नहीं बैठ सकतीं, उन्हें हर अन्याय के विरोध में आगे आना होगा। महिलाओं को अपनी सुरक्षा को लेकर कुछ बातों पर ध्यान देना होगा।

  • महिलाएं सुनिश्चित कर लें कि जहां भी काम कर रही हैं, वहां पोश एक्ट के तहत कमेटी बनाई गई है या नहीं।
  • अपने यूनियन लीडर के संपर्क में रहें और अपने हर मुद्दे को मंच पर उठाती रहें।
  • कोई भी घटना होने पर चुप न रहें, सामने आएं और उसका विरोध करें।
  • अपने साथ काम करने वाली साथियों को भी बोलने के लिए प्रेरित करें।
  • पुलिस और कमेटी के सामने रिपोर्ट करने में झिझक न रखें।
  • यदि पुलिस और कमेटी में सुनवाई नहीं हो रही है तो सिविल कोर्ट जाएं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here