उरईडबरी/डोंगरगढ़: संत कबीरदास जी भारतीय इतिहास के अनमोल रत्नों में से एक है। हर वर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को कबीरदास जयंती के रुप में मनाया जाता है। कबीरदास जी जन्म से हिन्दू थे और परवरिश एक मुस्लिम परिवार में हुआ। वे इन दोनों धर्मों में होने वाले ढोंग का पूरजोर विरोध करते थे उन्होंने मूर्ती पूजन, व्रत -उपासना जैसे ढोंग का खुलकर विरोध किया। कबीरदास जी का मानना था कि भगवान हर प्राणी में बसते हैं और किसी भोग, त्याग से प्रसन्न नहीं होते। कबीरदास जी जैसे श्रेष्ठ मानव कई दशकों में एक बार ही जन्म लेते है। वे महान प्रतिभा के धनी थे। संत कबीरदास भक्तिकाल के प्रमुख कवि थे। कबीरदास जी न सिर्फ एक संत थे बल्कि वे एक विचारक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में समाज की बुराईयों को दूर करने के लिए कई दोहे और कविताओं की रचना की। संत कबीरदास जी हिंदी साहित्य के ऐसे कवि थे, जिन्होंने समाज में फैले आडंबरों को अपनी लेखनी के जरिए उस पर कुठाराघात किया था। संत कबीरदास जी ने आजीवन समाज में फैले बुराईयों और अंधविश्वास की निंदा करते रहे। उन्होंने अपने दोहों के माध्यम से जीवन जीने कि सीख दी है। आज भी लोग कबीरदास जी के दोहे गुनगुनाते हैं।एक बार संत कबीरदास जी से किसी ने पूछा कि आप दिन भर कपड़ा बुनते रहते हैं तो भगवान का स्मरण कब करते हैं। कबीरदास जी उस व्यक्ति को लेकर अपनी झोपड़ी से बाहर आ गए बोले। यहां खड़े रहो। तुम्हारे सवाल का जवाब सीधे न देकर ,मैं उसे दिखा सकता हूं। कबीर साहेब ने दिखाया कि एक औरत पानी की गागर सिर पर रखकर लौट रही थी। उसके चेहरे पर प्रसन्नता और चाल में रफ्तार थी। उमंग से भरी हुई वह नाचती हुई सी चली जा रही थी। गागर को उसने पकड़ नहीं रखा था, फिर भी वह पूरी तरह संभली हुई थी। कबीरदास जी ने कहा उस औरत को देखो। वह जरूर कोई गीत गुनगुना रही है। शायद कोई प्रियजन घर आया होगा। वह प्यासा होगा, उसके लिए वह पानी लेकर जा रही है। मैं तुमसे जानना चाहता हुं कि उसे गागर की याद होगी या नहीं।
संत कबीर कि बात सुनकर उस व्यक्ति ने जबाव दिया, उसे गागर कि याद नहीं होती तो अब तक तो गागर नीचे ही गिर चुकी होती। कबीर साहेब बोले,यह साधारण सी औरत सिर पर गागर रखकर रास्ता पार करती है। मजे से गीत गाती है, फिर भी गागर का ख्याल उसके मन में बराबर बना हुआ है। और तुम मुझे इससे भी गया गुजरा समझते हो कि मैं कपड़ा बुनता हूं और परमात्मा का स्मरण करने के लिए मुझे अलग से वक्त की जरूरत है। मेरी आत्मा हमेशा उसी में लगी रहती है। कपड़ा बुनने के काम में शरीर लगा रहता है। और आत्मा प्रभू चरणों में लीन रहती है। आत्मा हर समय प्रभू के चिंतन में डुबी रहती है। इसलिए ये हाथ भी आनंदमय होकर कपड़ा बुनते रहते हैं। पनिका समाज के हारुन मानिकपुरी ने बताया कि कबीर प्रकट दिवस कबीर साहेब के धरती पर प्रकट होने के अवसर पर मनाया जाता है। संत कबीर साहेब भारत में उत्तर प्रदेश के काशी में लहरतारा तालाब पर एक कमल के फूल पर अवतरित हुए थे। मुस्लिम दंपति नीरु नीमा नामक जुलाहा उन्हें वहां से उठाकर घर ले गए थे जोकि उनके मुंह बोले माता पिता कहलाए। संत कबीर साहेब जी को पूरी दुनिया में एक जुलाहा, कवि, या संत मानती है।
संत कबीरदास जी अपने दोहों के जरिए लोगों के मन में व्याप्त भ्रांतियों को दूर किया। साथ ही धर्म के कट्टरपंथ पर तीखा प्रहार किया था। उन्होंने समाज को सुधारने के लिए कई दोहे कहे इसी की वजह से ये समाज सुधारक कहलाए। उस समय समाज में कई तरह के अंधविश्वास फैले हुए थे। एक अंधविश्वास में भी कायम था कि काशी में मृत्यु होने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति होती है तो वहीं मगहर में मृत्यु होने पर नरक भोगना पड़ता है। लोगों में फैले इस अंधविश्वास को दूर करने के लिए संत कबीरदास जी पूरे जीवन काशी में रहे लेकिन अंत समय में मगहर चले गए और मगहर में ही उनकी मृत्यु हुई। कहा जाता है कि कबीर साहेब जी को मानने वाले लोग हर धर्म से थे इसलिए जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके अंतिम संस्कार को लेकर हिंदू और मुस्लिम दोनों में विवाद होने लगा। कहा जाता है कि इसी विवाद के बीच जब शव से चादर हटाई गई तो वहां पर केवल फूल थे। इन फूलों को लोगों ने आपस में बांट लिया और अपने धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार किया।
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