राजनांदगांव : प्रमुख मानवीय शौक तथा विशेष तकनीक कला को समर्पित विश्व फोटोग्राफी दिवस के विशिष्ट परिप्रेक्ष्य में नगर के विचारप्रज्ञ व्यक्तित्व डॉ. कृष्ण कुमार द्विवेदी ने चिंतन विमर्श में बताया कि फोटोग्राफी मानवीय हुनर-कला को सहज-सुंदर-सुदृश्य में प्रदर्शित करने वाला एक प्रशंसनीय आयाम है। जिसके लिए प्रारंभ से ही कैमरे का प्रयोग होते आया है। फोटोग्राफी व्यवसायिक कर्म-कार्य के साथ-साथ कला प्रेमी व्यक्तियों के लिए खास महत्व रखता है। विशेषकर जो प्रकृति के अनुपम-अद्भुत-अनूठे सौंदर्यधारित प्राकृतिक वादियों के नजारों एवं नित्य जीवनचर्या के खुशहाल मनोहारी पलों के सुदृश्यों को कैमरे में कैद कर लेना पसंद करते है। वास्तविकता में फोटोग्राफी आम-खास सभी के लिए अपनी कला दक्षता को प्रदर्शित करने का एक सरल मौका अवसर प्रदत्त करती हैं। इसकी विशिष्टता है जो बिना शब्दों के कैमरे की सहायता से मानवीय अंर्ततम्य केन्द्रित सृजित-कल्पित तथ्यों को सुदृश्य रूप में बयां करने का श्रेष्ठ-श्रेयष्कर अवसर भी प्रदान करती हैं।
ल्लेखनीय है कि 9 जनवरी 1839 में संसार में फोटोग्राफी की ट्रेकिक तकनीकी का आविष्कार हुआ आगे एक से एक कैमरे आते गए। पहले श्वेत-श्याम फोटो ग्राफी, फिर रंगीन फोटोग्राफी का बेहद उत्साह भरा जमाना आया और वर्तमान समय में तो मोबाईल कैमरा आ जाने से प्राय: अधिसंख्य जन-जन को फोटोग्राफर बना दिया है। सैल्फी फोटोग्राफी ने तो अखिल विश्व में धूम मचा दी है और फोटो ग्राफी के डिजिटल स्वरूप ने तो संपूर्ण मानवीय सभ्यता को चमत्कृत कर रखा है। डॉ. द्विवेदी के अनुसार मूलत: फोटोग्राफी ब्रम्हाण्ड के जीवंत ग्रह पृथ्वी की प्रकृति अनुकूलित वादियों में रची-बसी, देश-दुनिया को कैमरे की नजर से देखने का एक नया तरीका सीखाती हैं। वस्तुत: जब आप कैमरे की नजर से दुनिया को देखना शुरू करते हैं तो अलग ही दुनिया दिखती हैं, जो बहुत, बहुत ही खुबसूरत नजर आती है। फोटोग्राफी एक उत्कृष्टम और विशुद्ध रचनात्मक कार्य-प्रक्रम है। जो कैमरे से मानवीय कौशल को कला विशिष्टता से प्रदर्शित करने का प्रादर्श सुअवसर देता है। आइये प्रकृति के सौंदर्य वादियों और जन-जीवन की सुखद स्मृतियों को संजोने के लिए सरल-सरस स्वरूप फोटोग्राफी को अपनी हॉबी - शौक बनायें। यही फोटोग्राफी दिवस का श्रेष्ठ संदेश है।
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