जमानत को निरस्त करने की मांग वाली याचिका हाईकोर्ट से खारिज

जमानत को निरस्त करने की मांग वाली याचिका हाईकोर्ट से खारिज

बिलासपुर :  रेप के झूठे मामले में फंसाने के प्रकरण में पुलिस ने एक महिला समेत दो आरोपियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 सहित अन्य धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया था। ट्रायल कोर्ट से आरोपी को जमानत मिल गई थी, जिसे निरस्त करने की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया है।

रायपुर निवासी पारसमणि चंद्राकर के खिलाफ एक महिला की शिकायत पर पुलिस ने धारा 376, 376(2)(एन) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। मामले में आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन बाद में उसे कोर्ट से जमानत मिल गई।जेल में रहने के दौरान पारसमणि चंद्राकर ने जेल अधीक्षक के माध्यम से थाना आरंग में शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने दावा किया कि महिला ने उसे साजिश के तहत झूठे मामले में फंसाया। इस शिकायत के आधार पर थाना खमतरी में महिला के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई, जिसके चलते उसे भी जेल जाना पड़ा।

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याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में तर्क दिया कि जमानत पर रिहा होने के बाद आरोपी गवाहों को प्रभावित कर रहे हैं। पुलिस द्वारा समन भेजने के बावजूद गवाह पेश नहीं हुए और वे बयान दर्ज कराने से बचते रहे, जिससे जांच प्रभावित हुई और आरोप पत्र दाखिल नहीं हो सका। वहीं, आरोपी महिला और सह-आरोपी की ओर से प्रस्तुत दलील में कहा गया कि जमानत की शर्तों के उल्लंघन का कोई ठोस प्रमाण याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत नहीं किया गया। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने याचिका को तथ्यहीन मानते हुए खारिज कर दिया।

मामले की जांच में सामने आया कि पारसमणि चंद्राकर और महिला की मुलाकात करीब 8-10 साल पहले रायपुर में हुई थी। अभियोजन के अनुसार महिला ने खुद को अविवाहित बताते हुए कहा कि वह अपने भाई के साथ रहती है। धीरे-धीरे दोनों के बीच प्रेम संबंध स्थापित हुआ, और महिला ने याचिकाकर्ता को शादी के लिए राजी किया। इसके बाद दोनों ने जगदलपुर के एक मंदिर में विवाह कर लिया। शादी के बाद महिला ने रायपुर में मकान बनवाने की मांग की, जिस पर पारसमणि ने करीब 15 लाख रुपये खर्च कर मकान बनवाया। दोनों साथ रहने लगे, लेकिन बाद में जब याचिकाकर्ता ने आर्थिक मदद बंद कर दी, तो महिला ने उसके खिलाफ रेप और पॉक्सो एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज करवा दी। कोर्ट ने मामले के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए पाया कि याचिकाकर्ता द्वारा जमानत रद्द करने के लिए दिए गए तर्क पर्याप्त नहीं थे। जमानत की शर्तों के उल्लंघन को लेकर कोई ठोस साक्ष्य नहीं होने के कारण हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी।

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