डौंडीलोहारा के 400 साल पुराने ईदगाह में ईद की नमाज अदा की गई

डौंडीलोहारा के 400 साल पुराने ईदगाह में ईद की नमाज अदा की गई

रमजान क्या है? रमजान के खत्म होने के बाद ही ईद क्यों मनाई जाती है?

  ईद क्या है?

रमजान फारसी शब्द है फारसी में रम्ज शब्द का मतलब माना जाता है, छोटे पत्थरों पर सूरज की पड़ने वाली तेज या तपती गर्मी। इस्लाम धर्म में माना जाता है कि इस महीने में कुरआन नाजिल हुई थी, इसलिए इसे पाक-ए-माह यानी पाक महीना कहा जाता है।दुनिया में सबसे पहला रोजा हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने रखा था. कहा जाता है कि उन्होंने शैतान के बहकावे में आकर अल्लाह ने मना किया था, उस फल को खा लिया था. इस वजह से उन्हें जन्नत से निकालकर धरती पर भेजा गया था. यहां उन्होंने कई सालों तक खुदा से माफ़ी मांगी और उन्हें रोज़ा रखने को कहा गया. कुरान में सूरह अल-बक़रह (2:183) में कहा गया है:"ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए, जैसे तुम से पहले लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे, ताकि तुम तक़वा (ईश्वर का भय और संयम) हासिल करो।"इस आयत से पता चलता है कि रोजा (उपवास) का नियम पिछले नबियों और उनके अनुयायियों पर भी लागू था, लेकिन इसके तरीके और समय अलग-अलग हो सकते थे। उदाहरण के लिए:मूसा (मोसेस) अलैहिस्सलाम: यहूदी परंपरा में मूसा के समय से उपवास का उल्लेख मिलता है, जैसे यौम किप्पुर (प्रायश्चित का दिन), जो इस्लाम से पहले की प्रथा थी।ईसा (यीशु) अलैहिस्सलाम: बाइबिल में भी उपवास का जिक्र है, जहां ईसा मसीह ने 40 दिन तक उपवास किया था।दाऊद (डेविड) अलैहिस्सलाम: हदीस में बताया गया है कि पैगंबर दाऊद एक दिन छोड़कर एक दिन रोजा रखते थे, जिसे "रोजा-ए-दाऊद" कहा जाता है।हालांकि, ये उपवास रमज़ान के रोजे की तरह अनिवार्य और व्यवस्थित नहीं थे। रमज़ान का रोजा इस्लाम में दूसरी हिजरी (622-623 ईस्वी) में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के मदीना प्रवास के बाद अनिवार्य हुआ। इससे पहले मुसलमान आशूरा (10 मुहर्रम) का रोजा रखते थे, जो यहूदी परंपरा से प्रेरित था, लेकिन बाद में रमज़ान के रोजे ने इसे मुख्य रूप से प्रतिस्थापित कर दिया।

रोजा (या रमज़ान का रोजा) इस्लाम धर्म में एक महत्वपूर्ण धार्मिक प्रथा है, जिसमें मुसलमान समस्त इंद्रियों का निग्रह करते हैं सूर्योदय से सूर्यास्त तक भोजन, पानी, और अन्य शारीरिक सुखों से परहेज करते हैं। यह रमज़ान के पवित्र महीने में रखा जाता है, जो इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है। उल-फितर की शुरुआत पैगंबर मुहम्मद ने मक्का छोड़ने के बाद मदीना में की थी। पहली बार ईद-उल-फितर 624 ई. में मनाई गई थी, जो इस्लामी इतिहास में पहले रमजान के अंत का प्रतीक थी। दुनिया भर के मुसलमानों ने ईद-उल-फ़ित्र मनाना शुरू कर दिया है, जो इस्लामी कैलेंडर में सबसे बड़े उत्सवों में से एक है। ईद-उल-फ़ित्र - जिसका अर्थ है "उपवास तोड़ने का त्यौहार" - रमज़ान के अंत में मनाया जाता है.


उल-फितर इस्लाम में एक खास पर्व है, जिसे रमजान के पूरे महीने रोजे रखने के बाद मनाया जाता है. यह दिन खुशी, इबादत और सभी मजहबों के बीच आपसी भाईचारे का प्रतीक माना जाता है. इस दिन मुसलमान अल्लाह का शुक्र अदा करते हैं कि उन्होंने उन्हें रमजान के रोजे रखने, इबादत करने और अपनी आत्मा को पवित्र करने का अवसर दिया.रोजा एक प्रकार का उपवास है, जो सुबह की नमाज़ (फज्र) से पहले शुरू होता है और शाम की नमाज़ (मग़रिब) के बाद खत्म होता है। इस दौरान न केवल खाने-पीने से परहेज किया जाता है, बल्कि बुरे विचारों, गलत व्यवहार, और नकारात्मक कार्यों से भी दूर रहा जाता है। रोजा सुबह से शुरू होने से पहले सहरी (सुबह का भोजन) खाया जाता है और शाम को इफ्तार (रोजा खोलने का भोजन) के साथ इसे तोड़ा जाता है।यह प्रथा केवल शारीरिक उपवास नहीं, बल्कि मानसिक और नैतिक शुद्धता का भी प्रतीक है.
         

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रोजा क्यों रखना चाहिए?
रोजा रखने के कई धार्मिक, आध्यात्मिक और सामाजिक कारण हैं:
1. ईश्वर के प्रति समर्पण: रोजा अल्लाह के प्रति आज्ञाकारिता और भक्ति का प्रतीक है। यह मुसलमानों को अपने धर्म के प्रति निष्ठा दिखाने का अवसर देता है।
2. आत्म-अनुशासन: यह इंसान को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण करना सिखाता है और संयम का अभ्यास कराता है।
3. आध्यात्मिक शुद्धि: रोजा आत्मा को शुद्ध करने और अल्लाह के करीब आने का साधन माना जाता है। यह ध्यान, प्रार्थना और कुरान पढ़ने का समय बढ़ाता है।
4. गरीबों के प्रति संवेदना: भूख और प्यास का अनुभव करके, रोजा रखने वाला व्यक्ति गरीबों और जरूरतमंदों की स्थिति को बेहतर समझ सकता है, जिससे दान और सहायता की भावना बढ़ती है।
5. समुदाय और एकता: रमज़ान में रोजा, इफ्तार और नमाज़ सामूहिक रूप से मनाए जाते हैं, जो मुस्लिम समुदाय में एकता और भाईचारे को मजबूत करते हैं।
6. स्वास्थ्य लाभ: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उपवास शरीर को डिटॉक्स करने और आत्म-नवीकरण में मदद कर सकता है, बशर्ते इसे सही तरीके से किया जाए।
         

इस्लाम में रोजा हर स्वस्थ वयस्क मुसलमान के लिए अनिवार्य है, लेकिन कुछ लोगों को छूट दी जाती है, जैसे बीमार इंसान, गर्भवती महिलाएं तथा जिन्हें मासिक धर्म हो रहा हो व मुसाफिर एक खास बात जिनसे रोजा किसी कारणवश छूट जाते हैं , वे बाद में रोजे पूरे कर सकते हैं या फिदिया (दान) दे सकते हैं।डौण्डी लोहारा मस्जिद में पूरे रमजान भर  मस्जिद  तरावीह के नमाजियों से गुलजार होती रही वही अल सुबह सहरी के साथ फजर की नमाज से दिन की शुरुआत होती रही यह सिलसिला पूरा एक माह तक मुसलसल जारी रहा इस बार तरावीह का नमाज इमाम मोहम्मद कुतुबुद्दीन अंसारी साहब ने दिया आज तारीख 31/03/ 2025 को सुबह 8:30 बजे डौडी लोहारा के मुसलमानो ने 400 साल पुराने ईदगाह में इमाम मोहम्मद कुतुबुद्दीन अंसारी साहब के इमामत में ईद के नमाज की  अदायगी की नमाज के बाद सभी मुस्लिम भाइयों ने गले मिलकर एक दूसरे को ईद की मुबारकबाद दी डौडी लोहारा मस्जिद के सदर शेख आदि सिद्दीकी ने कहा कि हमने नमाज के बाद हिंदुस्तान में एक दूसरे के भाईचारे के लिए व हिंदुस्तान के विकास के लिए व पूरी दुनिया में अमन व शांति के लिए अल्लाह तआला से दुआ की आज के ईद उल फितर के नमाज में डौडी लोहारा के साथ ही आसपास गांव  के मुसलमान खासकर 98 वर्षीय शेख गौस मोहम्मद शेख रसूल सिद्दीकी सद्दाम तिगाला असलम तिगाला सलीम तिगाला मोहम्मद अब्दुल फिरोज खान मोहम्मद  मलक कौनैन खान, मोहम्मद लबीब खान,मोहम्मद लईक खान,शेख फिरोज,फारूख,जब्बार तिगाला वह अन्य सैकड़ो मुसलमान ने  ईदगाह में ईद उल फितर की नमाज अदा की।

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