परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद : अप्रैल का महीना लगते ही भीषण गर्मी का और भी तेजी से बढ़ने लगा है। वहीं गर्मी के दिनों में निस्तारण व पेयजल का संकट भी गहराने लगता है तो कृषकों की फसलों के लिए पानी की किल्लत होने लगती है।पेयजल तो सरकार और प्रशासन किसी भी तरह से अपने स्तर पर पूर्ति हेतु प्रयास कर लोगों को राहत देने का प्रयास करती है फिर भी अनेकों जगह इस संकट से लोगों को जैसे तैसे गुजरना पड़ता है। वहीं हम छत्तीसगढ़ की बात करें तो प्रधानमंत्री नल जल योजना कई जगहों पर अब भी अधुरा है और शुरू नहीं हो पाया है जबकि ये काम पिछले दो सालों से चल रहा है लेकिन जिस गति से पुरा होना चाहिए अब तक नहीं हो पाया। वहीं हम जल स्तर की बात करें तो दिनबदिन जमीन के नीचे होता जा रहा है।

नदियों की बात करें तो नदी सिमट कर सुखते जा रहा है जबकि हम पिछले 15-20 सालों की बात करें तो ग्रामीण क्षेत्र के लोगों का निस्तार नदी के झरिया के माध्यम से हो जाता था और नलकुप से पीने का पानी का गुजारा कर लेते थे। लेकिन वर्तमान समय की बात करें तो गर्मी के दिनों में नदी, तालाब और हेडपंप सुख जाते हैं वहीं अधिकांश हेडपंप सुख कर खराब भी हो चुका है। एक तरफ सरकार और प्रशासन ग्रामीण क्षेत्रों में जल स्त्रोतों को बनाए रखने के लिए कई डबरी एवं डायवर्सन का निर्माण भी कराया वहीं रोजगार गारंटी अंतर्गत किसानों को भी डबरी खनन हेतु प्रोत्साहित किया, लेकिन हम डबरी, डायवर्सन और तालाब की बात करें तो इस क्षेत्र में अधिकांश सुखा पड़ा है और उसमें एक बुंद पानी भी नहीं है। हालांकि पेयजल आपूर्ति हेतु गांवों में बोर खनन कर पंप लगाया गया है जिससे लोगों का निस्तार होता है वहीं ग्रामीण अंचल की बात करें तो लाईट बंद और लो-वोल्टेज के चलते लोगों को पानी के काफी जद्दोजहद करते देखने को मिलता है।

वनाधिकार पट्टे के चलते लोगों ने अधिकांश जंगल को काटकर काबिज हो गए, वहीं छोटे छोटे नाले जैसे पानी के स्रोत जो गर्मियों में जंगली जानवर और पशु,पक्षियों के लिए पीने का पानी का साधन था ओ अब खेती के जमीन में तब्दील हो गया। जिसके चलते पशु पक्षी ओर जानवर अब पानी की तलाश में गांव की ओर कुच करने लगे हैं।
हालांकि की अभी तो जैसे तैसे करके लोगों का निस्तार और गुजारा हो रहा है लेकिन आने वाले कुछ वर्षों में पानी की इस गंभीर संकट को किस प्रकार झेलेंगे यह एक बड़ी गंभीर और सोचनीय विषय प्रतीत होता है।

सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में भी वन विभाग और पंचायतों एवं किसानों को पेड़ लगाने का कई प्रयास किया, लेकिन आज वे रोपित कितने पेड़ जिवित है यह सबके सामने है हालांकि पेड़ लगाकर फोटो सोशल मीडिया पर खुब चला इसमें कोई कमी नहीं रही। एक तरफ कृषक भी जिस प्रकार सरकार ने बागवानी खेती के लिए योजना चलाकर प्रयास किया वह आज उतना सफल दिखाई नहीं देता जिस प्रकार आज होना चाहिए।हम वर्तमान में तो इस जल संकट से निपटने जैसे तैसे तैयार तो हैं लेकिन आने वाले भावी पीढ़ी को इस संकट से हम कैसे बचा सकते हैं उन भविष्य की पीढ़ी को कैसे राहत दे सकते हैं इसके लिए सरकार, प्रशासन और हम सब कितने गंभीर हैं ये बड़ा गंभीर सवाल है?

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