झारखंड का हजारीबाग इन दिनों एक अलग ही कारण से चर्चा में है. यहां की धरती पर अब महाराष्ट्र का बादशाह आम, ‘हापुस’ यानी अल्फांसो फलने लगा है. वो आम, जो अब तक केवल रत्नागिरी और कोंकण की पहचान था, अब झारखंड के कृषि अनुसंधान केंद्र डेमोटांड़ में सफलता से उगाया जा रहा है. आश्चर्य की बात ये है कि यह आम पूरी तरह रसायनमुक्त तकनीक से उगाया गया है और इसकी कीमत बाजार में 2500 रुपये प्रति किलो तक जा पहुंची है.
2007 में हुआ था पहला प्रयोग, अब बन चुका है ब्रांड
केंद्र के माली राजेश कुमार बताते हैं कि हापुस आम की खेती यहां 2007 में एक एक्सपेरिमेंट के तौर पर शुरू की गई थी. शुरुआत में संशय था कि क्या यह आम झारखंड की जलवायु में फल सकेगा, लेकिन कुछ वर्षों बाद ही यह प्रयोग सफलता में बदल गया. अब तो केंद्र में लगे सात अल्फांसो आम के पेड़ों से हर साल लगभग 10 क्विंटल आम की पैदावार हो रही है.
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कृत्रिम रसायन नहीं, स्वाद में सबसे बेहतरीन
राजेश कुमार का दावा है कि ये आम किसी भी तरह के केमिकल या पेस्टीसाइड के बिना उगाए जाते हैं. यही कारण है कि इसके स्वाद और सुगंध में अल्फांसो की पारंपरिक पहचान आज भी बरकरार है. उन्होंने कहा कि लोग इसे इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि यह न केवल स्वादिष्ट है, बल्कि पूरी तरह शुद्ध और प्राकृतिक भी है.”
बाजार में भारी मांग, कीमतें आसमान पर
जहां सामान्य आम की कीमत 60–70 रुपये प्रति किलो रहती है, वहीं अल्फांसो आम की कीमत 1500 से 2500 रुपये प्रति किलो तक जाती है. इसकी डिमांड रांची, हजारीबाग और रामगढ़ के होलसेल व्यापारियों में सबसे अधिक है. इस साल फसल कुछ कम हुई है, लेकिन मांग अब भी बनी हुई है.
राजेश ने बताया कि आम अभी पूरी तरह पके नहीं हैं, इसलिए बिक्री शुरू नहीं की गई है.
10–15 दिनों में फल पकने के बाद बाजार में लॉन्च किया जाएगा.
एक आम का वजन 200–350 ग्राम, पेड़ पर पके फल की खास डिमांड
अल्फांसो आम की विशेषता यह है कि लोग उसे पेड़ पर पका हुआ पसंद करते हैं, जिससे उसका स्वाद और अधिक निखर जाता है. यह आम सिर्फ दिखने में सुंदर नहीं, बल्कि इसमें घनी सुगंध, रसीला गूदा और कम फाइबर होता है, जो इसे विशिष्ट बनाता है. एक आम का वजन औसतन 200 से 350 ग्राम के बीच होता है.
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स्थानीय किसानों के लिए बना प्रेरणा स्रोत
यह सफलता हजारीबाग के किसानों के लिए प्रेरणादायक मॉडल बन चुकी है.
कई स्थानीय किसान अब अल्फांसो जैसे हाई-प्रोफिट फलों की खेती की ओर रुख कर रहे हैं.
राज्य सरकार यदि इसे समर्थन दे तो झारखंड का यह इलाका भी फल उत्पादन में एक नया केंद्र बन सकता है.
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