बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में झूठे विवाह के वादे पर दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए युवक को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया है। निचली अदालत ने आरोपी को 10 साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकलपीठ ने कहा कि पीड़िता न केवल बालिग और विवाहित थी, बल्कि वह एक शासकीय अधिकारी के रूप में कार्यरत थी और अपने भले-बुरे का निर्णय स्वयं लेने में सक्षम थी। इस परिस्थिति में यह नहीं माना जा सकता कि आरोपी ने उसके साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाए या विवाह का झूठा वादा कर उसे धोखा दिया।
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सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नाइम अहमद बनाम दिल्ली राज्य और एक अन्य मामले का हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि बालिग और विवाहित महिला जो वर्षों तक सहमति से संबंध रखती है, वह झूठे वादे के आधार पर दुष्कर्म का दावा नहीं कर सकती।
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आत्मसमर्पण की आवश्यकता नहीं
न्यायालय ने कहा - इस मामले में कोई ऐसा ठोस प्रमाण नहीं है जिससे यह साबित हो कि पीड़िता ने संबंध केवल विवाह के झूठे वादे के कारण बनाए। इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया गया। हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का दोषसिद्धि आदेश रद्द किया और आरोपी को पूरी तरह बरी किया। कोर्ट ने यह भी कहा कि आरोपी जमानत पर था, उसे आत्मसमर्पण की आवश्यकता नहीं है।
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