धान की सीधी बुआई यानी Direct Seeding of Rice (DSR) आज खेती में एक क्रांतिकारी तरीका बनकर उभर रहा है. इस तरीके में सूखे खेतों के लिए सी-ड्रिल मशीन और गीले खेतों में ड्रम सीडर का इस्तेमाल किया जाता है. इससे धान के बीज तय दूरी और गहराई में खेत में बोए जा सकते हैं लेकिन इस तरीके से किसानों को असली में क्या फायदा है? आइए जानते हैं.
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इस तरीके से आसान होती है खेती
दरअसल, पलामू जिला में 50 हजार हेक्टेयर में धान की खेती होती है. पलामू जिले में खरीफ मौसम की मुख्य फसल धान है, जिसे यहां के किसान पारंपरिक तरीके से करते हैं. वहीं इन दिनों आधुनिक तकनीक के रूप में धान की सीधी बुआई काफी मशहूर हो रही है. इस तरीके से खेती आसान हो जाती है और मजदूरों की जरूरत भी कम पड़ती है.
ड्रम सीडर मशीन से फायदा
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने लोकल 18 को बताया कि गीले खेतों में नर्सरी और रोपा करने से बेहतर है कि किसान ड्रम सीडर मशीन का सहारा लें. इसकी खास बात यह है कि यह मशीन एक दिन में तीन एकड़ खेत में सीधी बुआई कर सकती है. इसका वजन लगभग सात किलो होता है, जिसे एक व्यक्ति आसानी से चला सकता है.
इसमें दो चक्के और चार से छह ड्रम होते हैं, जिनमें दो किलो तक बीज भरा जा सकता है. इससे खेत में 8 से 12 कतारों में 20 सेंटीमीटर की दूरी पर बीज गिरता है. जहां एक एकड़ में रोपा विधि से बुआई करने के लिए 12 मजदूर लगते हैं, जिसमें 5 से 7 हजार रुपये प्रति एकड़ खर्च आता है, यह खर्च इस तकनीक से बच जाता है.
15 से 20 हजार रुपये की बचत
इस तकनीक से किसानों की एक हेक्टेयर में 15 से 20 हजार रुपये तक की बचत होती है. जहां पारंपरिक तरीके से एक हेक्टेयर में धान लगाने में 30 हजार रुपये तक खर्च होता है, वहीं डीएसआर तकनीक से यही काम 10 से 12 हजार रुपये में हो जाता है. इसके अलावा, धान की फसल समय से 8 से 10 दिन पहले तैयार होती है और उत्पादन में भी थोड़ी बढ़ोतरी होती है.
टांड़ वाले खेतों में भी हो सकती है धान की खेती
धान की सीधी बुआई एक ऐसा तरीका है जिससे आप टांड़ वाले खेतों में भी अच्छी फसल ले सकते हैं. सी ड्रिल मशीन में प्रति एकड़ 50 से 60 किलो बीज लगता है, जिससे 100 दिनों में 30 से 60 क्विंटल तक उत्पादन मिल जाता है. इस तरीके से पांच गुना कम लागत में बेहतर फसल ली जा सकती है. खासकर टांड़ वाले इलाकों में यह तकनीक वरदान साबित हो रही है.
रोपा विधि की तुलना में सीधी बुआई ज्यादा फायदेमंद
उन्होंने आगे कहा कि पारंपरिक खेती में नर्सरी बनाकर धान की रोपाई करनी पड़ती है, जिसमें ज्यादा पानी लगता है. लेकिन डीएसआर तकनीक में गेहूं की तरह सीधे खेत में बीज बोए जाते हैं. बुआई के एक हफ्ते बाद खेत में धान के पौधे दिखने लगते हैं. खरपतवार रोकने के लिए पेंडिमेथिलीन दवा का छिड़काव किया जाता है. इस प्रक्रिया में 25% कम पानी की जरूरत होती है, साथ ही फसल 8 से 10 दिन पहले तैयार हो जाती है.
इतने रुपये की बचत
उन्होंने कहा कि धान की सीधी बुआई से किसानों को 5,000 से 6,000 रुपये प्रति एकड़ की सीधी बचत होती है. यह तकनीक न केवल लागत घटाती है, बल्कि पानी भी बचाती है और पर्यावरण की रक्षा में भी मदद करती है. इसे किसान अपनाकर आधुनिक तरीके से खेती कर सकते हैं.
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