भाद्रपद मास की अष्टमी की रात्रि, जब पूरा वृंदावन भक्ति और उल्लास में डूबा होता है, बांके बिहारी मंदिर का दृश्य अलौकिक हो जाता है। दीपों की झिलमिलाहट, भजनों की मधुर लहरियां और श्रद्धालुओं के जयकारे सब मिलकर ऐसा वातावरण रचते हैं, मानो स्वयं ब्रज में कृष्ण जन्म की बेला लौट आई हो। यहां जन्माष्टमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि भगवान और भक्त के बीच प्रेम का ऐसा उत्सव है, जिसे अनुभव करने मात्र से हृदय आनंद से भर उठता है।
बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी का महत्व
वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर, भगवान श्रीकृष्ण के प्रेम और भक्ति का एक अद्भुत केंद्र है। यहां जन्माष्टमी केवल एक त्यौहार नहीं, बल्कि एक दिव्य अनुभव है। पूरे मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़, भजनों की मधुर गूंज और रात्रि भर चलने वाला कीर्तन, वातावरण को अद्वितीय बना देता है।
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इस दिन बांके बिहारी जी का विशेष शृंगार होता है। उन्हें नए वस्त्र, गहनों और फूलों से सजाया जाता है। रात 12 बजे, जैसे ही भगवान का जन्म महोत्सव आरंभ होता है, पूरा मंदिर "नंद के आनंद भयो" के जयकारों से गूंज उठता है। यहां की एक खास परंपरा यह है कि जन्माष्टमी पर भगवान को पालने में झुलाया जाता है, और भक्त अपने हाथों से झूला झुलाकर अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
माना जाता है कि जन्माष्टमी पर बांके बिहारी जी के दर्शन मात्र से मनुष्य के सारे दुख दूर होते हैं और जीवन में प्रेम, आनंद और सौभाग्य का संचार होता है। यह पर्व भक्त और भगवान के बीच प्रेम के उस अटूट बंधन को और मजबूत करता है, जो युगों से चला आ रहा है।
वृंदावन में कब मनाई जाएगी जन्माष्टमी?
वृंदावन में जन्माष्टमी का मुख्य उत्सव इस बार 16 अगस्त, शनिवार को होगा। इस दिन मंदिर परिसर और आस-पास का हर कोना फूलों, रंग-बिरंगे पर्दों और दीपमालाओं से सजा होगा। रात ठीक 12 बजे बांके बिहारी मंदिर के गर्भगृह में ठाकुरजी का पंचामृत (दूध, दही, शहद, घी और गंगाजल) से अभिषेक किया जाएगा।
इसके बाद भगवान को रेशमी वस्त्र पहन कर सोलह शृंगार से सजाया जाएगा। यह पूरा कार्यक्रम बेहद पारंपरिक और गोपनीय तरीके से होता है, और इस दौरान गर्भगृह के दर्शन आम भक्तों के लिए बंद रहते हैं।

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