मुखिया के मुखारी - अपनों की लाशों पे राजनीति लंबी नहीं चलती

मुखिया के मुखारी - अपनों की लाशों पे राजनीति लंबी नहीं चलती

अल-फलाह एक अरबी शब्द है जो सफलता, समृद्धि, कल्याण या मोक्ष,सफलता की ओर का समनार्थी है,सकरात्मक शब्द शैक्षणिक संस्थान होकर भी बदनाम हो गया, इस विश्वविद्यालय में शिक्षा नैतिकता और मानवता से इतनी परे थी की मानव सेवा की शपथ लेने वाले चिकित्सक रक्षक नही भक्षक बन बैठे और कई उसी रास्ते पर चलने आतुर हैं । आतंक से सम्बद्धता का इस विश्वविद्यालय का ये पहला मामला नहीं हैं ,मसले गाहे बगाहे कई बार उभरे लेकिन इस बार आतंक का पूरा गिरोह फुट पड़ा, विश्वविद्यालय के संस्थापक कई अपराधिक कृत्यों में संलिप्त रहें हैं ,न जाने कैसे उन्हें विश्वविद्यालय खोलने की अनुमति मिल गई?कहने बताने को तो ये अल-फलाह विश्वविद्यालय था पर पढाई आतंक की होती थी, श्रेष्ठ मानवीय मस्तिष्क जो चिकित्सा शिक्षा ले रहे थे उनके उपर ऐसा कौन सा जादू चल गया की वों आतंकी बन बैठे ,जिन्हें न अपने जीवन का मोह रहा, न दुसरो का, जिन हांथों में आला होना था वों आले दर्जे के आतंकी फिदाईन बन गए, उनकी इस मनोवृत्ति का कोई तो कारण होगा,समस्या को न मानने से समस्या दूर नही हो जाती ,शुतुर्मुर्गीय रवैये से सच बदल नही जाता,कल तक आतंक के लिए अशिक्षा को जिम्मेदार बताने वालों के मुंह पर ये एक तमाचा है,जब कहा जाता था बगदादी,लादेन,अफजल जैसे कई उच्च शिक्षित आतंकियों के आका हैं जिनके शिक्षित होने में उन्हें आतंकी बनने से नही रोका,आतंक शिक्षा की अनुगामी कैसे बन गई ?

ये भी पढ़े :मुखिया के मुखारी -छत्तीसगढ़ आपकी राजनीति को समझ रहा है शैनै: शैनै: 

दारुल हरम, दारुल इस्लाम, काफ़िर जैसे शब्दों ने अपना जादू दिखाया, जिहाद के नाम पर आतंक ने पुरे विश्व में आतंक मचाया, भौगोलिक ,धार्मिक सीमाओं से परे वैश्विक आतंक के मूल में धर्मांधता है ,जड़ता और कट्टरता ने सह अस्तित्व की जगह संघर्ष को ही अपना मंजिल मान लिया है ,जहां दो अलग -अलग धर्म हैं टकराव सिर्फ वहीँ नही है,स्वधर्मी देशो में भी नरसंहार हो रहे ,आतंकी बम फोड़ रहे,क्या ऐसी वजह है,जिसकी वजह से पूरा विश्व आतंक से ग्रस्त है ,दो धर्मों की लड़ाई में एक धर्म हमेशा इस्लाम है,भारतीय उपमहाद्वीप ने भी इस्लामिक आक्रांताओं का क्रूर, वीभत्स ,कुकृत्य देखा और सहा है ,नादिर शाह से लेकर औरंगजेब तक का शासन उनकी धर्मांधता ,मूर्ति भंजक ,जजिया ,जौहर, धर्मांतरण जैसे दुष्कृत्यों से भरा पड़ा है । देश की भौगोलिक, राजनैतिक, सामाजिक परिवेश को इस्लामी आक्रांताओं ने बदल डाला ,बलात धर्मांतरण से हुए इस्लाम के प्रचार ने 19वीं सदी में भारत का बंटवारा करा दिया ,सदियों से साथ रहते आए हिन्दू और पूर्व हिंदुओं {मुस्लिमों } के बीच मुस्लिम लीग ने इतनी गहरी खाई बनाई की देश दो हिस्सों में बंट गया ,अंग्रेज बांटे या हम बंटे यदि बंटवारा हुआ तो फिर स्वतंत्रता कैसे मिली? हमे तो बंटवारे में आधी भूमि मिली, आधे भूमि में हम स्वतंत्रता का जश्न मनातें हैं ,इतिहास से सीख न लेकर फिर वही गलती दोहरा रहे, जिन पाकिस्तानियों को हिंदुस्तान की संस्कृति से लगाव नहीं था उनका अलग होना ही श्रेयस्कर था, पर जिन्होंने 1946 के चुनावों में मुस्लिम लीग को भर -भर के मत दिया पाकिस्तान बनवाया फिर भी यहीं रह  गए, इनकी मनोवृत्ति की आवृत्ति आज भी बदलती रहती है ,रह -रह कर मुस्लिम उम्मा का प्रेम जगता रहता है ।

जब देश में आतंकी घटना हो तो मौन विदेशों की घटनाओं पर देश की सड़कें जाम ,देश से वास्ता नहीं गाजा से नाता ,भाई से प्रेम नहीं पड़ोसियों से गलबहियां है, जहां सरिया है वहां नही रहना ,जहां सरिया नहीं हैं वहां रहना सरिया की मांग करना क्या नैतिकता है ? या बलात अपनी धार्मिक श्रेष्ठता को स्थापित करना बांग्लादेशी तो पाकिस्तान के साथ भी नहीं रह पाएं फिर वों हिन्दुस्तानियों के कैसे अपने हो सकतें हैं ? 1947 में जो बंटवारा लेकर चले गए थे वों आज घुसपैठिये बनकर भी भारत में रहने को व्याकुल हैं ,क्या ऐसा लगाव है जो अब जागृत हुआ है ? बांग्लादेश में हिंदुओं पर रोज अत्याचार हो रहे ,नरसंहार हो रहा फिर क्यों बांग्लादेशी भारत में आश्रय ढूंढतें हैं?  संसाधनों का बंटवारा करके फिर भारत के संसाधनों पर डाका डाल रहे, संख्याबल बढ़ाने की ऐसी चाहत क्यों है? क्या 1971 के एहसानों का अहसास बांग्लादेशियों को तनिक भी है, बंगाल में बांग्लादेशियों का घुसपैठ सिर्फ बंगाल की नहीं राष्ट्रीय समस्या है ,राजनीतिज्ञ सत्ता के लिए पलटी मार रहे, ममता संसद में कुछ बंगाल में कुछ और करती बोलतीं हैं ,घुसपैठियों के लिए पलक पावड़े बिछातीं हैं ,जन सांख्यिकी बदल जाए तो सत्ता की डोर भी बदलनी है, देश का हिस्से 1947 में हो चूका और कितने हिस्से करने का इरादा है ?घुसपैठिये वीडियों में अपनी घुसपैठ की कहानी बता रहे, सबूत खुद दिखा रहे ,फिर भी ममता है की SIR का विरोध कर रही, बिना सर के अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहीं, मीर जाफर ,जयचंद आज भी कुख्यात हैं, न जानें क्यों फिर कुछ राजनीतिज्ञों को उन्हीं का पथानुगामी बनना है, सत्ता के लिए बस खता ही खता करना है, सुधर जाओं क्योंकि -------------------------------------अपनों की लाशों पे राजनीति लंबी नहीं चलती

चोखेलाल

आपसे आग्रह :

कृपया चोखेलाल की टिप्पणियों पर नियमित रूप से अपनी राय व सुझाव इस नंबर 6267411232 पर दें, ताकि इसे बेहतर बनाया जा सके।

मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी









You can share this post!


Click the button below to join us / हमसे जुड़ने के लिए नीचें दिए लिंक को क्लीक करे

Comments

  • No Comments...

Leave Comments