मुखिया के मुखारी - राजनीतिक उदंडता से भविष्य बिखरता है 

मुखिया के मुखारी - राजनीतिक उदंडता से भविष्य बिखरता है 

छत्तीसगढ़ में आदिवासी सत्ता वर्षों से रहीं हैं,आदिवासी राजाओं की बहुलता वाले रजवाड़ों का स्वर्णिम इतिहास रहा है,शहीद वीर नारायण सिंह का संघर्ष और बलिदान छत्तीसगढ़ की थाती है ,स्वतंत्रता के बाद इन्हीं राजाओं और आदिवासियों ने राजनीतिक कमान संभालीं वों विधायक ,सांसद और मंत्री बने, छत्तीसगढ़ गठन के बाद आदिवासी नेतृत्व की मांग ने जोर पकड़ा ,विष्णुदेव साय छ.ग . के मुख्यमंत्री बने आदिवासी { कवंर } समाज के हांथ में राजनैतिक नेतृत्व आया वैसे तो अजीत जोगी भी अपने आप को आदिवासी कहते थे पर वों मतांतरित ईसाई थे, उनकी जाति पर सबसे ज्यादा प्रश्न कांग्रसियों ने ही लगाए आज भी उनकी जाति विवादों में घिरी हुई है, जिस छत्तीसगढ़ में आदिवासी सत्ता कालांतर से स्थापित है, वहां शासन के मुखिया की तस्वीरों पर चप्पलों की बरसात किस मनोदशा से की गई शासन के कौन से कृत्य कुकृत्य बन गए ,जो कांग्रेसियों ने आदिवासी मुख्यमंत्री के सम्मान को भंग करने का दुस्साहस किया ?यदि ऐसे ही मापदंडो पर पूर्ववर्ती सरकार का आंकलन किया जाए तो क्या होगा ? घपले घोटालों की दाऊ दलाल गिरोह की सरकार ने  अनपढ़ आदिवासी मंत्री को जेल पहुंचा दिया ,भ्रष्टाचार का रंग ऐसे रंगा की अधिकारी ,व्यापारी, नेता सबको दलाली में भविष्य दिखने लगा,छत्तीसगढ़ को खूब लुटा तब तो ये चप्पल न उठे ,न बरसे ,तब क्या सारे अपराधिक कृत्य क्षम्य थे? 

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बहुमत की वजह से जनता के अभिमत नगण्य थे ? हिडमा के लिए तो रायपुर से दिल्ली तक रुदाली बने जा रहे हो , इस रुदन के लायक कौन सा कृत्य हिडमा ने किया ? आम जनता ,सुरक्षाबलों का नरसंहार किया, झीरम घाटी को अंजाम दिया, आम लोगों की जान की कीमत नेताओं के लिए सिर्फ एक संख्या है ,पर अपने नेताओं की झीरम घाटी  में हुई शहादत भूल जाना कौन सी नैतिकता है? क्या हिडमा के लिए चप्पल उठाओगे ? उसके लिए भी ऐसा प्रदर्शन करोगे या सिर्फ आदिवासी अस्मिता से खेलोगे ?मुख्यमंत्री ने कौन सा ऐसा कृत्य किया जो कांग्रेसियों को चप्पल बरसाने का अधिकार मिला? धरना प्रदर्शन के कारण तो सामान्य हैं पर घटनाक्रम असामान्य है,क्या ये दुस्साहस सहजता का दुरूपयोग नही हैं?  यदि मुखिया का आत्मसम्मान ऐसे कलंकित होगा, ये कलंक की चादर कभी भी किसी भी छत्तीसगढ़िया को ओढ़ा दी जाएगी, कांग्रेस देश की आजादी के पहले से सत्ता सुख भोग रही ,नेहरु जी सितम्बर 1946 से कैबिनेट मिशन प्लान के तहत देश के प्रधानमंत्री बने उन्ही के कार्यकाल में कांग्रेस कार्यसमिति ने देश के विभाजन का प्रस्ताव पास किया ,फिर भी कांग्रेसी विभाजन का उत्तरा दायित्व नहीं लेते, कांग्रेस जिन -जिन राज्यों से सत्ता से बाहर हुई वहां फिर कभी पुरानी स्थिति में नहीं लौटी ,बंगाल ,बिहार ,उत्तरप्रदेश ,गुजरात, तमिलनाडु ,ओड़िसा मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में अपना राजनैतिक वजूद खो पिछलग्गू क्षेत्रीय पार्टी की भूमिका में आ गई है।

राष्ट्रीय राजनीति में अपनी ही भूमिकाओं को मरणासन्न कर रही है ,विपक्षी अकर्मण्यता के वही नजारे छत्तीसगढ़ में पेश कर रही है, एक दल विपक्ष में रहकर सिफर से सत्ता के शिखर तक पहुँच गया और आप सत्ता के शिखर से फिसलकर सिफर हो गए ,फिर भी विपक्षी राजनीति की सीख नही सीख पाएं ,ये भौंडे मुद्दे आपको राजनीतिक संतुष्टि तो दिला सकतें हैं पर छत्तीसगढ़ की जनता का मन नही जिता सकते ,इन मुद्दों से बहुमत नहीं पा सकते ,अराजकता के जिस दौर में छत्तीसगढ़ को धकेलने की कोशिशें निरंतर की जा रहीं है,उन साजिशों की पर्तें रोज उखड़ रहीं हैं ,पर इन उखड़नों से कब आपका वास्ता रहा ?घपले घोटालों का माथा पर टिका लगाए घूम रहे, दुष्कृत्यों के बाद भी रोज नए दुष्कृत्य लडियां कुकर्मो की कोई राजनीतिक बखत नही बनाएगी, न्यायधानी भी धन्य है, है तो न्यायधानी पर राजनीतिक अराजकता असीम है, हांथ पैर ,मुंह ,लाठी ,डंडे, कुर्सियां जब चाहे चल जाती है,फर्जी डिग्री बांट छत्तीसगढ़ियों के भविष्य से खेलनेवाला शहर का भविष्य बन जाता है, क्या यही न्यायधानी की न्यायप्रियता की पहचान है ? मुखिया का सहज होना प्रशासनिक बाधाएं उत्पन्न करें तो इस सहजता को तिजौरी में रख देना चाहिए ,आपकी सहजता का असर देखिए की बस्तर ओलंपिक का विज्ञापन उस चैनल को जा रहा है जो भाजपा और भाजपा की नीतियों को कोसने के सारे जतन करता है ,आप कौन सा संबंध और क्यों बना रहें हैं जो छ .ग.की सरकार और भाजपा की छवि धूमिल करने में लगें हैं, उनकी जेबें आपका जनसंपर्क विभाग क्यों भर रहा है?  क्या ये सहजता आपकी प्रशासनिक छवि को सवांरेगी या फिर छवि धूमिल होगी ये एक मिशाल है ऐसी कई मिशालें मशाल बन जल उठेंगी तब क्या जागेंगे ? राजनीति हमने देख ली खूब पर छत्तीसगढ़ की छवि में नही आने देंगे कोई धुल क्योंकि ---------------राजनीतिक उदंडता से भविष्य बिखरता है ।

चोखेलाल

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मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी









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