बस्तर: उम्र और रिश्ते-नातों के बंधन से हटकर परीक्षा में शामिल होकर लोहण्डीगुडा के धरमाऊर में पति-पत्नी हाड़ीराम कश्यप व हेमवती कश्यप, कुरंदी में दिव्यांग मंगली, बस्तर के मांदलापाल में सास-बहू, वहीं लोहण्डीगुडा के टाकरागुड़ा में देवरानी-जेठानी ने साक्षरता के महत्व का संदेश दिया।आदर्श परीक्षा केंद्र चिलकुटी में जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा स्वयंसेवी छात्राओं का पुष्पगुच्छ देकर सम्मान किया गया, जिससे केंद्र में उत्साह का माहौल रहा।
उल्लास परीक्षा के जिला नोडल अधिकारी राकेश खापर्डे ने बताया कि स्वयंसेवियों द्वारा बिना किसी आर्थिक प्रोत्साहन के असाक्षरों को पढ़ाने का यह कार्य समाज में साक्षरता और जागरूकता का उज्ज्वल उदाहरण है। उल्लास महापरीक्षा ने बस्तर में न केवल शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाई है, बल्कि समाज के हर वर्ग में यह संदेश भी दिया है कि सीखने की कोई आयु नहीं होती - संकल्प और प्रयास ही सफलता की कुंजी हैं।
ये भी पढ़े : मुखिया के मुखारी -पक्ष -विपक्ष मस्त,छत्तीसगढ़िया पस्त है
हथियार छोड़ माओवादियों ने कलम-किताब थामा
जगदलपुर में माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने वाले कई आत्मसमर्पित माओवादी (पुनर्वासित) जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा अब निरक्षरता का दाग मिटाने कलम-किताब थामकर पढ़ाई में जुटे हैं। इनमें साक्षर बनने की ललक देखी जा रही है। रविवार को बस्तर जिले में साक्षरता को जनआंदोलन का रूप देने आयोजित उल्लास महापरीक्षा में माओवादी पुनर्वास केंद्र आड़ावाल के 40 आत्मसमर्पित पुनर्वासित माओवादी भी शामिल हुए।
कहीं पति-पत्नी और सास-बहू तो कहीं मां-बेटा
इनका कहना था कि माओवाद हिंसा के रास्ते में जाकर निरक्षर बने रह गए, अब निरक्षरता का कलंक धोने का अवसर मिला है। नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत उल्लास महापरीक्षा में केंद्रीय कारागार जगदलपुर के 70 महिला-पुरुष बंदी भी शामिल हुए। रोचकता इस बात को लेकर भी रही कि कहीं पति-पत्नी, सास-बहू, मां-बेटा भी विद्यार्थी बनकर परीक्षा दी। परीक्षा में उम्र की सीमा दिखी न अन्य किसी तरह का बंधन बस एक ही उद्देश्य नजर आया कि हर कोई निरक्षरता से बाहर आने को लालायित दिखा।
‘स्वागत परीक्षा’ के रूप में सम्मिलित किया गया
परीक्षा के लिए जिले में 771 केंद्र बनाए गए थे। जहां 36 हजार से अधिक परीक्षार्थी शामिल हुए। परीक्षा को लेकर इनमें गजब का उत्साह था। कुछ केंद्रों को आदर्श परीक्षा केंद्र के रूप में विकसित किया गया था। जिला शिक्षा अधिकारी बीआर बघेल से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि नवभारत साक्षरता कार्यक्रम के तहत स्वयंसेवियों द्वारा 200 घंटे की पढ़ाई पूर्ण करने वाले असाक्षरों ने इस महापरीक्षा में हिस्सा लिया, वहीं जिन शिक्षार्थियों की पढ़ाई 200 घंटे से कम थी, उन्हें ‘स्वागत परीक्षा’ के रूप में सम्मिलित किया गया। विदित हो कि वर्ष 2030 तक देश में सौ प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य तय किया गया है।

Comments