नई दिल्ली : कुछ दिन पहले कहीं समाचार देखा कि आईआईटी, खड्गपुर में डीन स्टूडेंट्स वैल बीइंग का पद सृजित कर उस पर एक प्रोफेसर की पदस्थापना की गई। यह कार्य विद्यार्थियों को उनके मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाने में सहायता करने और उनके मानसिक स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए किया गया था। उसके कुछ दिन बाद देश के कुछ और विश्वविद्यालयों में भी ऐसी ही मिलती-जुलती पदस्थापनाएं देखने को मिलीं। ऐसी व्यवस्था भारत के बाहर विदेश के विश्वविद्यालयों में कुछ समय से हो रही हैं, लेकिन ऐसा भारत में होना आश्चर्य का विषय था। उससे ज्यादा आश्चर्य का विषय यह था कि इस तरह की पदस्थापनाओं को लेकर बुद्धिजीवी समाज में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई और कहा गया कि शैक्षणिक परिसरों में जेन जी के बढ़ते मानसिक तनावों को हल करने में ऐसी व्यवस्था करने से सहजता होगी।
अलग है इनकी पसंद
जेन जी को लेकर कुछ समय से समाज में लगातार विमर्श जारी है। उनके बदलते तेवरों को देख हैरानियां भी हदें पार करती जा रही हैं। प्रोफेशनल कालेज में पढ़ाने वाली बिटिया से, जो स्वयं भी अभी युवा श्रेणी में आती है, जब पूछा कि वह अपनी कक्षा में पढ़ रहे जेन जी के बच्चों के व्यवहार में कैसा अंतर पाती है, तो उसके उत्तर चौंकाने वाले थे। उसने बताया कि जेन जी के लिए समोसा, फैटी, आइली और हैवी होता है, लेकिन पिज्जा या बर्गर नहीं। उसने यह भी कहा कि उसके छात्र ‘ही’ या ‘शी’ की चौखट में बैठना पसंद नहीं करते, ‘दे’ या ‘दैम’ की ही संज्ञा चाहते हैं। यानी ऐसा संबोधन चाहते हैं, जो लिंग विशेष के लिए न हो। यही जेनरेशन अलाव देखकर उस पर भुट््टे, चने या गेहूं की बालियां नहीं, मार्शमेलो भूनकर खाना पसंद करती है। हो सकता है कि दिल्ली, मंुबई, कोलकाता, बेंगलुरु, चेन्नई के ही जेन जी के बच्चे ऐसा सोचते हों, लेकिन क्या भोपाल, रायपुर, लखनऊ, चंडीगढ़, रांची, अहमदाबाद या कोच्ची के जेन जी के बच्चे इससे कुछ अलग सोचते हैं? मुरैना, बैतूल, अमरावती, इटावा, बरेली, भागलपुर, मेरठ के बच्चे इससे कुछ और अलग सोचते होंगे? यह प्रश्न गंभीर है। इसलिए भारतीय समाज व्यवस्था, सांस्कृतिक ताना-बाना और परंपरागत लोकाचार में हम परिवार को प्राथमिकता देते हैं और संवाद हमारी विशेषता है। हम मूलतः भावनात्मक समाज हैं और हमारे लिए भाव व्यावसायिक या आर्थिक हितों से ऊपर हैं।
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याद आते हैं वो विचार तंत्र
यह भी जानकर आश्चर्य हुआ कि जेन जी के इन विद्यार्थियों का रहन सहन और सोच का समर्थन उन्हीं की जनरेशन के शिक्षक बने युवा भी करते हैं। यह सोचना आवश्यक है कि जेन जी के सोच को हमारे देश की संस्कृति और परंपरा के सांचे में ढालने और उनके मानसिक स्वास्थ्य को सकारात्मक और रचनात्मक दिशा में लाने के लिए हमें किस विचार तंत्र की आवश्यकता होगी। ऐसे में हमें याद आते हैं स्वामी विवेकानंद, जो आज से लगभग 130 साल पहले भी युवाओं को उनका जीवन संवारने और ऐसी रचनात्मक योजना देने की दृष्टि रखते थे, जो आज भी प्रासंगिक और सामयिक नजर आती है।
यह भी रोचक है कि जब हम युवा शब्द का प्रयोग स्वामी विवेकानंद के दृष्टिकोण से या सरकार मान्य परिभाषा के आधार पर करते हैं, तो हम सामान्यतया 15 वर्ष से 35 वर्ष की आयु समूह को ध्यान में रखते हैं, लेकिन अगर आधुनिक परिभाषा से देखें, तो इस समूह में मिलेनियल्स, जेन जी और जेन अल्फा तीन पीढ़ियां आ जाएंगी।
परंपराजनित हो उपाय
स्वामी विवेकानंद ने फरवरी 1897 में मद्रास (अब चेन्नई) के विक्टोरिया हाल में भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने शिकागो यात्रा से लौटने के बाद युवाओं को संबोधित करते हुए अपनी क्रांतिकारी योजना का प्रकटीकरण किया था। सामाजिक दोषों और समाज में आए नैतिक विचलन के बारे में स्वामी जी कहा था, ‘हमें केवल यह समझना होगा कि सामाजिक दोषों के निराकरण का कार्य उतना वस्तुनिष्ठ नहीं, जितना आत्मनिष्ठ। हम कितनी भी लंबी-चौड़ी डींग क्यों न हांकें समाज के दोषों को दूर करने का कार्य स्वयं के लिए जितना शिक्षात्मक है, उतना समाज के लिए वास्तविक नहीं।’ हम आज युवाओं, विशेषकर जेन जी को लेकर, उनके मानसिक स्वास्थ्य, जीवन मूल्यों को लेकर चिंतित हैं। उनसे संवाद करने के लिए हम जो सूत्र अपना रहे हैं, वो हमारे अपने परंपराजनित नहीं हैं और हमारे परिवेश से मेल नहीं खाते।
योजना का हो उचित पालन
हमने युवाओं के सांस्कृतिक विकास और मानसिक स्वास्थ्य के लिए क्या योजना बनाई है, यह महत्वपूर्ण प्रश्न है। हम उनसे किस तरह संवाद साध रहे हैं, यह परीक्षण का विषय है। युवा हमारा डेमोग्राफिक डिविडेंट हैं, लेकिन यह हमारे लिए तभी लाभकारी हैं, जब हम इसकी ठीक ढंग से साज संभाल करें और उनका भलीभांति सांस्कृतिक और चारित्रिक विकास करें, लेकिन युवाओं के चारित्रिक विकास के लिए कोई भी योजना बनाने से पूर्व हमें अपने देश का चरित्र और देश की जीवन शक्ति को समझना होगा।’
युवा पीढ़ी से हो परिचय
वर्ष 1897 में स्वामी जी द्वारा किया गया आह्वान आज भी शाश्वत है। वे बाहें फैलाकर देश के युवाओं को आलिंगनबद्ध करने के लिए उत्सुक रहे। उनका कहा गया हर शब्द शाश्वत अमृत तुल्य है, जो हमें किसी भी सामाजिक समस्या से उबारने में सहायक है। जिस देश का महान संत, प्रेरणापुरुष अपने विचारों से समूचे विश्व का कल्याण करने की क्षमता रखता हो, वह देश किसी विशेष व्यावसायिक उद्देश्य से उछाले गए जेन जी जैसे तात्कालिक विशेषण को लेकर चिंतित हो, यह उस देश के विचारशील, चिंतनशील नागरिकों को शोभा नहीं देता। आवश्यकता इस बात की है, हम स्वामी विवेकानंद का युवा पीढ़ी, विशेषकर जेन जी से सही परिचय करवाएं।
दिग्भ्रमित न हों युवा
आज हम हमारे देश के युवाओं के चारित्रिक उन्नयन और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं। आज हमारे शिक्षा संस्थान और विचार केंद्र अलग अलग समीकरणों को अपना कर ऐसे उपायों की खोज में लगे हैं, जिससे हमारे युवा, हमारे जेन जी हमारी परंपरा और संस्कृति के रास्ते पर चल सकें। वहीं कुछ राष्ट्रद्रोही लोग ऐसी स्थिति का लाभ लेकर युवाओं को दिग्गभ्रमित करने में भी लगे हैं। स्वामी जी ने सदा युवाओं की क्षमता और निष्ठा पर विश्वास किया। वे जानते थे कि सही प्रेरणा और मार्गदर्शन से वे पूरे विश्व को सकारात्मक दिशा में मोड़ सकते हैं। युवाओं की अद्वितीय रचनात्मकता तथा सामर्थ्य के प्रति वे आग्रही और उत्साही थे। मद्रास में जब उन्होंने भाषण दिया, तब उनकी आयु मात्र 34 वर्ष की थी। यानी अभी की परिभाषा में वे युवा ही थे, लेकिन उन्होंने अपनी गहन अंतर्दृष्टि से वह सब देख समझ लिया था, जो भविष्य के गर्भ में था। इतना ही नहीं, उन्होंने जीवनपर्यंत युवाओं के साथ रहकर उन्हें प्रेरणा देने का व्रत भी ले लिया था। इस भाषण के अंत में कहा था, ‘ऐ मेरे देशवासियो, मेरे मित्रों, मेरे बच्चों, राष्ट्रीय जीवनरूपी यह जहाज लाखों लोगों को जीवनरूपी समुद्र के पार करता रहा है। कई शताब्दियों से यह कार्य जारी है। मैं तुम सबको प्यार करता हूं, क्योंकि तुम देवताओं की संतान हो, महिमाशाली पूर्वजों के वंशज हो। तब भला मैं तुम्हें कैसे कोस सकता हूं, यह असंभव है। तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण हो। मैं तुम्हारे पास आया हूं, अपनी सारी योजनाएं तुम्हारे सामने रखने के लिए। यदि तुम उन्हें सुनो, तो मैं तुम्हारे साथ काम करने को तैयार हूं।’
स्वामी जी के तीन मंत्र दिए
स्वामी जी का विश्वास था कि इन सूत्रों के सहारे हम कठिन से कठिन परिस्थिति से देश को उबार सकते हैं। स्वामी जी तो पूरे विश्वास के साथ युवाओं से यह भी अपेक्षा करते थे कि वे समूचे विश्व का कल्याण करें। इसलिए तो उन्होंने कहा था, ‘मेरे मित्रों, मेरे विचार हैं कि मैं भारत में ऐसे शिक्षालय स्थापित करूं, जहां हमारे नवयुवक अपने शास्त्रों के ज्ञान में शिक्षित होकर भारत तथा भारत के बाहर अपने धर्म का प्रचार कर सकें। आवश्यकता है तेजस्वी, श्रद्धा संपन्न और दृढ़विश्वासी निष्कपट नवयुवकों की। ऐसे 100 मिल जाएं तो संसार का कायाकल्प हो जाए।’
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