रामानुजगंज : छत्तीसगढ़–झारखंड सीमा पर स्थित रामानुजगंज अंतरराज्यीय परिवहन चेक पोस्ट आज यातायात नियंत्रण का नहीं, बल्कि अवैध वसूली के सुनियोजित तंत्र का प्रतीक बनता जा रहा है। यहां नियमों की जांच कम और ‘सेटिंग सिस्टम’ ज्यादा सक्रिय दिखता है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि इस चेक पोस्ट से होकर गुजरने वाला शायद ही कोई वाहन ऐसा हो, जिसने व्यवस्था को “मासिक योगदान” न दिया हो।
ओवरलोडिंग के कारण बलरामपुर जिले की सड़कें बुरी तरह टूट चुकी हैं। रंगीला चौक से कृषि उपज मंडी बैरियर तक सड़कें जानलेवा हो चुकी हैं, जहां वाहन नहीं चलते, बल्कि झटकों में उछलते हैं। इसी रास्ते से गुजरने वाले आम नागरिक रोज़ धूल फांकते हैं, हादसों के साए में सफर करते हैं और कई बार जान भी गंवा बैठते हैं। सवाल यह है कि जब सड़कें टूट रही थीं, तब परिवहन विभाग की आंखें आखिर बंद क्यों थीं?
यात्री बसों की हालत और भी भयावह है। बसों में क्षमता से कहीं अधिक सवारियां ठूंस दी जाती हैं। यात्री जानवरों की तरह लादे जाते हैं, न बैठने की जगह, न सुरक्षा के इंतजाम। बावजूद इसके, इन बसों पर कार्रवाई कभी-कभार होती है — वह भी तब, जब ऊपर तक “रिपोर्ट” भेजनी हो। बाकी दिनों में यही बसें बिना रोक-टोक दौड़ती रहती हैं।
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परिवहन आयुक्त के निर्देश का हवाला देकर हाल ही में चेक पोस्ट पर एक चेकिंग अभियान चलाया गया। दावा किया गया कि 10 यात्री वाहनों पर कार्रवाई कर 10,500 रुपये की राजस्व वसूली की गई। लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि यह कार्रवाई नियम पालन से अधिक, कागज़ी खानापूर्ति प्रतीत होती है। सवाल यह है कि जब सैकड़ों ओवरलोड वाहन रोज़ इसी चेक पोस्ट के सामने से गुजरते हैं, तो कार्रवाई सिर्फ 10 वाहनों तक ही क्यों सिमट गई?
सबसे गंभीर आरोप झारखंड से आने-जाने वाले पिकअप वाहनों को लेकर हैं। स्थानीय सूत्र बताते हैं कि इन वाहनों से हर महीने तयशुदा रकम वसूली जाती है। नतीजा यह है कि ओवरलोड पिकअप वाहनों की कतारें चेक पोस्ट के सामने से बेखौफ गुजरती हैं, घंटों जाम लगता है, लेकिन परिवहन विभाग की कार्रवाई नदारद रहती है।
विडंबना यह है कि जर्जर सड़कों पर जहां हर मिनट हादसे का खतरा बना रहता है, वहीं उसी जगह परिवहन विभाग के कर्मचारी वाहनों को घंटों खड़ा कर जांच के नाम पर खुलेआम वसूली करते देखे जाते हैं। यह दृश्य अपने आप में व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल खड़ा करता है — क्या विभाग की चिंता सड़क सुरक्षा है या सड़क किनारे चलता अवैध कारोबार?
इस पूरे मामले में जब चेक पोस्ट प्रभारी शेषनारायण ध्रुव से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया, तो फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझा गया। न कॉल रिसीव हुई, न कॉल बैक। यह चुप्पी भी कई सवालों के जवाब खुद ही दे जाती है।
यदि परिवहन विभाग सच में यात्रियों की जान-माल की सुरक्षा को लेकर गंभीर है, तो फिर रामानुजगंज से झारखंड की ओर जाने वाली छड़ और सीमेंट से लदी भारी ओवरलोड गाड़ियों पर रोज़ कार्रवाई क्यों नहीं होती? क्या नियम सिर्फ चुनिंदा वाहनों के लिए हैं, या फिर पूरा सिस्टम ‘मैनेजमेंट’ के भरोसे चल रहा है?
आज जरूरत दिखावे की नहीं, बल्कि निष्पक्ष और रोज़ाना कार्रवाई की है। वरना यह चेक पोस्ट जांच केंद्र नहीं, बल्कि अवैध वसूली का स्थायी अड्डा बनकर रह जाएगा — और इसकी कीमत सड़क पर चलने वाला आम नागरिक अपनी जान से चुकाता रहेगा।

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