जनवरी में खीरे की बुवाई किसानों के लिए लाभकारी साबित होती है. ठंड के बावजूद 'लो-टनल विधि' से बुवाई करने पर पौधे जल्दी बढ़ते हैं और मार्च तक फसल तैयार हो जाती है. इस समय बाजार में खीरे की मांग अधिक होने के कारण किसान सामान्य दिनों की तुलना में दोगुना भाव कमा सकते हैं. इस खबर में हम आपको कुछ ऐसी उन्नत किस्मों के बारे में बताएंगे जो कम लागत और कम समय में प्रति हेक्टेयर लाखों का शुद्ध मुनाफा देती है. जिससे बाजार में भी इनकी अच्छी डिमांड रहती है.
जनवरी में खीरे की बुवाई से किसानों को ऑफ-सीजन लाभ मिलता है, क्योंकि मार्च की शुरुआत में बढ़ती गर्मी और खीरे की मांग के समय फसल बाजार में पहुंचती है. इसलिए किसान कम समय और कम लागत में तैयार होने वाली उन्नत खीरे की किस्में चुनकर खेती कर सकते हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि सही तकनीक और समय पर की गई मेहनत से किसान इस खेती से कम समय और लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं.
जनवरी में उत्तर भारत में कड़ाके की ठंड होती है, जिससे बीजों के अंकुरण में समस्या आ सकती है. इसलिए, अभी 'लो-टनल विधि' से ही बुवाई करना चाहिए. इसमें बेड बनाकर बीजों की बुवाई की जाती है और उसके ऊपर पारदर्शी प्लास्टिक की फिल्म लगा दी जाती है. यह प्लास्टिक कवर पौधों को पाले से बचाता है और अंदर गर्मी बनाए रखता है, जिससे पौधे तेजी से बढ़ते हैं और फसल समय पर तैयार होती है.
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पंत संकर 1 खीरे की एक लोकप्रिय संकर किस्म है, जो अपनी उच्च उपज और रोग प्रतिरोधक क्षमता के कारण पहचानी जाती है. अगर किसान इसकी बुवाई जनवरी में करते हैं, तो यह मात्र 50 दिनों के भीतर पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. कम समय में तैयार होने वाली यह किस्म किसानों को प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल तक का बंपर उत्पादन देने की क्षमता रखती है, जिससे शुरुआती बाजार का लाभ मिलता है.
जिला उद्यान अधिकारी डॉ पुनीत कुमार पाठक ने बताया कि आईसीएआर द्वारा विकसित पीसीयूएच 3 एक उन्नत किस्म है, जो मोज़ेक वायरस और पाउडरी मिल्ड्यू जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोधी है. इसके मध्यम आकार के फल लगभग 20 सेंटीमीटर लंबे होते हैं. बुवाई के ठीक 50 दिन बाद यह पहली तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है. उत्पादकता के मामले में यह बहुत आगे है, जिससे किसान प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल तक की शानदार उत्पादन ले सकते हैं.
किसानों के बीच भरोसेमंद 'पोइन्सेट' (Poinsette) किस्म अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए प्रसिद्ध है. यह डाउनी मिल्ड्यू, पाउडर मिल्ड्यू और मोजैक वायरस से लड़ने में सक्षम है. 50 से 55 दिनों में तैयार होने वाली यह किस्म उच्च गुणवत्ता वाले फल देती है. इस किस्म की खेती से किसान 220 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन ले सकते हैं, जो इसे व्यावसायिक एंगल से एक बहुत ही लाभदायक विकल्प बनाता है.
अधिक मुनाफे की चाह रखने वाले किसानों के लिए डीसीएच 1 एक बेहतरीन किस्म है. यह किस्म विशेष रूप से अपने भारी उत्पादन के लिए लोकप्रिय है. इसकी खेती से प्रति हेक्टेयर 250 से 270 क्विंटल तक की उपज ली जा सकती है. यह बुवाई के 50 से 55 दिनों के भीतर कटाई के लिए उपलब्ध हो जाती है. यह कम लागत में अधिक उत्पादन देती जिससे किसानों की आय में इजाफा होता है.
पूसा उदय अगेती खेती के लिए एक अच्छी किस्म है, जिसे किसान अभी भी लगा सकते हैं. यह किस्म 50 से 55 दिनों में पहली तुड़ाई के योग्य हो जाती है और प्रति हेक्टेयर 200 से 230 क्विंटल तक उत्पादन प्रदान करती है. इसकी खेती से न केवल जल्दी फसल मिलती है, बल्कि बाजार में शुरुआती आवक होने के कारण किसानों को बहुत अच्छा दाम मिलता है.
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