विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने हाल ही में एक नया कानून पेश किया है, जो देशभर में चर्चा का विषय बन गया है। सरकार का कहना है कि यह कानून उच्च शिक्षा के संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने और समानता बढ़ाने के लिए लागू किया गया है।
हालांकि, इसके बाद अगड़ी जातियों यानी सवर्ण समाज के लोगों में असंतोष और विरोध की लहर उठ गई है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान में सवर्ण समाज के लोग सड़क पर उतरकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं।
UGC नियम 2026 क्या कहता है?
इस नए नियम को 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने का नियम, 2026' कहा गया है। यह 15 जनवरी 2026 से सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में लागू हो चुका है। नियम के अनुसार अब अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किया गया है। इसका मकसद शिक्षा में समान अवसर प्रदान करना है।
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सवर्णों की चिंताएं
सवर्ण समाज का मानना है कि इस नियम का गलत इस्तेमाल संभव है। उनके अनुसार:
अगड़ी जातियों के छात्रों और शिक्षकों को झूठे मामलों में फंसाया जा सकता है।
दुर्भावनापूर्ण शिकायतों को रोकने के लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
कमेटियों में जनरल कैटेगरी के प्रतिनिधियों की कमी से निर्णय एकतरफा हो सकते हैं।
ड्राफ्ट में मौजूद झूठी शिकायतों पर जुर्माना या सस्पेंशन का प्रावधान हटा दिया गया है।
कौन कर रहा विरोध?
मुख्य विरोध ब्राह्मण संगठन, कायस्थ महासभा, वैश्य संगठन और करणी सेना कर रहे हैं। इन चारों ने मिलकर सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4) बनाई है। उत्तर प्रदेश के विश्व हिंदू संगठन ने इसे हिंदू समाज को बांटने की साजिश बताया है। साथ ही, ये संगठन बीजेपी के सामान्य कैटेगरी के नेताओं से सवाल कर रहे हैं कि वे इस कानून पर चुप क्यों हैं।
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