भारत में क्यों बढ़ रहे हैं मानसिक विकार के मामले?

भारत में क्यों बढ़ रहे हैं मानसिक विकार के मामले?

नई दिल्ली :  देश में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति तेजी से बिगड़ रही है, विशेषकर युवाओं में। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के आंकड़ों के अनुसार मानसिक विकारों के 60 प्रतिशत मामले 35 वर्ष से कम के युवाओं में पाए जा रहे हैं।

यह युवाओं पर बढ़ते दबाव, प्रतिस्पर्धा, बेरोजगारी, सामाजिक अपेक्षाओं और अन्य कारकों को दर्शाता है, जो डिप्रेशन, एंग्जायटी और अन्य विकारों को बढ़ावा दे रहे हैं। आयु वर्ग के 7.3 प्रतिशत भारतीय युवा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। पर, उपचार तक पहुंच बेहद सीमित ( एक प्रतिशत) है। 

यह बता रहा कि देश चुपचाप ऐसे संकट की ओर बढ़ रहा है जो न तो सड़क पर दिखता है और न ही अस्पतालों की पर्चियों में पूरी तरह दर्ज होता है। यही वजह है कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी बीमारियां देश की बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गई है। विशेषज्ञों की स्पष्ट चेतावनी है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो यह अदृश्य संकट देश की सामाजिक और आर्थिक सेहत पर भारी पड़ सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय और संसद में प्रस्तुत बेंगलुरु के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेस (निमहांस) का राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य 

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यूनिसेफ के अनुसार 18 से 29 वर्ष सर्वेक्षण और 2024-25 में प्रकाशित विभिन्न मेडिकल जर्नल चेतावनी दे रहे हैं कि देश की बड़ी आबादी मानसिक तनाव, अवसाद और चिंता विकारों से जूझ रही है, लेकिन इलाज तक पहुंच बेहद सीमित है । निमहांस के सर्वे विश्लेषण में सामने आया है कि 13 से 17 वर्ष वाले लगभग 7.3 प्रतिशत किशोर किसी न किसी मानसिक विकारों से पीड़ित हैं। प्रतिस्पर्धा, परीक्षा - दबाव, सामाजिक अपेक्षाएं व डिजिटल जीवन- शैली इसके प्रमुख कारण हैं।

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएमएचएस) के अनुसार अधिकांश उपचार तक पहुंच ही नहीं पाते। यही वजह है कि इनका ट्रीटमेंट गैप 60 प्रतिशत से अधिक है, जबकि सामान्य मानसिक विकारों (डिप्रेशन और एंग्जायटी) में यह 80 से 85 प्रतिशत तक है। लैंसेट साइकियाट्री जर्नल में प्रकाशित ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज स्टडी के अनुसार, 2017 में भारत में 19 करोड़ 73 लाख लोग (कुल आबादी का लगभग 14.3 प्रतिशत) मानसिक विकार से पीड़ित थे। इनमें 4.57 करोड़ डिप्रेशन और 4.49 करोड़ एंग्जायटी डिसआर्डर के मामले थे।

वर्तमान में यह स्थिति चिंताजनक स्तर पर पहुंच गई है। इसी अध्ययन में दिल्ली व अन्य शहरों की स्थिति ज्यादा गंभीर है। 25.92 प्रतिशत दिल्ली के स्कूली किशोर डिप्रेशन व 13.70 प्रतिशत एंग्जायटी से पीड़ित पाए गए । यदि समय रहते ध्यान न दिया गया, तो यह आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विकास पर असर डालेगा। सरकार और समाज को मिलकर इस संकट का समाधान निकालना होगा, ताकि युवा पीढ़ी को एक स्वस्थ और सकारात्मक जीवन जीने का अवसर मिल सके।

अधिकांश नहीं मानते बीमारी

इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलाजी जोधपुर व ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल जर्नल आफ मेंटल हेल्थ सिस्टम्स में जनवरी 2024 में प्रकाशित अध्ययन अनुसार देश में मानसिक बीमारी की स्व- रिपोर्टिंग दर एक प्रतिशत से भी कम है। अधिकांश अपनी मानसिक समस्या को बीमारी ही नहीं मानते हैं, जिससे समस्या उपचार तक नहीं पहुंच पाती।










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