नई दिल्ली : 26 जनवरी को जब देश की राजधानी दिल्ली के कर्तव्यपथ (पहले राजपथ) पर टैंक गरजते हैं, झांकियां निकलती हैं और राष्ट्रपति तिरंगा फहराकर परेड की सलामी लेते हैं, तो हमें एक ‘तैयार’ भारत दिखाई देता है - एक संप्रभु, एकीकृत और संवैधानिक राष्ट्र। लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे का इतिहास न तो छोटा है और न ही आसान। इसके भीतर छिपी है मेहनत, मशक्कत और देश को एक सूत्र में बांधने की इच्छाशक्ति की लंबी कहानी।
15 अगस्त 1947 को हमारा देश आज़ाद तो हो गया था, लेकिन एक राष्ट्र के रूप में पूरी तरह तैयार नहीं हुआ था। उस दिन भारत के नक्शे पर 565 देसी रियासतें अधूरे पहेली के टुकड़ों की तरह बिखरी हुई थीं - हर टुकड़े की अपनी शर्त, अपना झंडा, अपना राजा और अपना घमंड।
यदि 26 जनवरी 1950 को भारत गणतंत्र बना, तो इसके पीछे उन 29 महीनों की वह अदृश्य लड़ाई थी, जिसमें सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन ने तलवार नहीं, बल्कि कूटनीति, दबाव, भय और समझौते के जरिए देश को जोड़ा।
यह कहानी उसी संघर्ष की है-
जहां कहीं किसी को नक्शा दिखाकर समझाया गया,
तो कहीं कुत्ते की शादी ने इतिहास का रुख बदल दिया,
कहीं टॉय ट्रेन देकर रियासत का रास्ता साफ हुआ,
और कहीं बंदूक की नोक पर ‘एक्सेशन’ के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कराए गए।
जब पटेल बोले - “सब्ज़ी क्या हवाई जहाज से मंगवाएंगे?”
सरदार वल्लभभाई पटेल और उनके सचिव वी. पी. मेनन ने 1947–48 के दौरान दर्जनों छोटी रियासतों के शासकों से व्यक्तिगत मुलाकातें कीं। ऐसी ही एक मुलाकात सौराष्ट्र क्षेत्र की किसी छोटी रियासत - भावनगर या उसके आसपास - के शासक से हुई, जिसने स्वतंत्र रहने की ज़िद पकड़ रखी थी।
तब पटेल ने टेबल पर भारत का नक्शा रखा और कहा, “आपकी रियासत चारों तरफ से भारतीय संघ से घिरी है। आप बाहरी दुनिया से कैसे जुड़ेंगे… क्या सब्ज़ी हवाई जहाज से मंगवाएंगे?” राजा साहब निरुत्तर हो गए और अगले ही दिन उन्होंने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (Instrument of Accession) पर हस्ताक्षर कर दिए।
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जूनागढ़ का नवाब और उसके कुत्ते की शादी
जूनागढ़ रियासत के नवाब मोहम्मद महाबत खानजी तृतीय अपने अजीब शौकों के लिए मशहूर थे। उन्होंने अपने कुत्ते की शादी पर लाखों रुपये खर्च किए, यूरोप से मेहमान बुलाए और सोने के बर्तनों में दावत दी।
फिर 15 अगस्त 1947 के बाद उन्होंने पाकिस्तान में मिलने की घोषणा कर दी, जबकि जूनागढ़ पूरी तरह भारत से घिरा हुआ था। भारत सरकार ने इस फैसले को अवैध माना। हालात बिगड़ने पर फरवरी 1948 में जनता से मतदान कराया गया, जिसमें लगभग 99.95% मतदाताओं ने भारत के पक्ष में वोट दिया। नवाब पाकिस्तान भाग गया और जूनागढ़ आधिकारिक रूप से भारत में शामिल हो गया।
हैदराबाद के निज़ाम के कमरे में थे हीरे ही हीरे
हैदराबाद के आखिरी निज़ाम मीर उस्मान अली खान को दुनिया के सबसे अमीर लोगों में गिना जाता था। उन्होंने भारत में विलय से इनकार कर दिया। स्थिति बिगड़ने पर भारत सरकार ने सितंबर 1948 में ‘ऑपरेशन पोलो’ चलाया। 13 से 17 सितंबर 1948 के बीच, यानी केवल पांच दिनों में हैदराबाद ने आत्मसमर्पण कर दिया और भारतीय संघ में शामिल हो गया।
भोपाल की बेगम पाकिस्तान में आम नागरिक की जिंदगी क्यों जीने लगीं?
भोपाल रियासत की शासक बेगम आबिदा सुल्तान पाकिस्तान समर्थक थीं और उन्होंने कहा था, “मेरा दिल पाकिस्तान के साथ है।” लेकिन भोपाल रियासत भारत के बीचों-बीच थी और वहां की जनता बेगम के फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतर आई।
भारत सरकार के दबाव और जनविरोध के बाद बेगम ने भोपाल की गद्दी पर अपना अधिकार छोड़ दिया और 1949 में पाकिस्तान चली गईं। इसके बाद भोपाल रियासत ने भारतीय संघ में विलय स्वीकार किया और 1 जून 1949 को आधिकारिक रूप से भारत का हिस्सा बन गई।
जोधपुर के महाराजा का ऐसा गुस्सा कि पिस्तौल उठाकर जिन्ना को धमकी
1947 में जोधपुर के युवा महाराजा हनवंत सिंह राठौड़ पाकिस्तान की ओर झुकने पर विचार कर रहे थे। वे कराची गए और पाकिस्तान के गवर्नर-जनरल मोहम्मद अली जिन्ना से मिले। बातचीत में तनाव इतना बढ़ गया कि महाराजा ने गुस्से में मेज़ पर रखी अपनी पिस्तौल उठा ली। अंततः भारत में विलय के फायदे - सुरक्षा, हथियार और आर्थिक मदद - समझ आने के बाद 11 अगस्त 1947 को उन्होंने भारत के पक्ष में दस्तखत कर दिए।
पटियाला के महाराजा: “पटेल साहब, आप सही कर रहे हैं”
पटियाला रियासत के महाराजा यदविंद्र सिंह शुरू से ही भारत समर्थक थे। उन्होंने सरदार पटेल से कहा था, “आप जो कर रहे हैं, वही सही है। ये रियासतें अलग रहीं तो देश टूट जाएगा।” उन्होंने कई मौकों पर पटेल को खुला समर्थन दिया और कहा जाता है कि एक बार उन्होंने उन्हें सोने की तलवार भेंट की थी। पटियाला 5 मई 1948 को भारतीय संघ में शामिल हुआ और बाद में पंजाब राज्य का हिस्सा बना।
बच्चे वाली रियासत: टॉय ट्रेन सेट से ही मान गए राजकुमार
कुछ छोटी रियासतों में शासक नाबालिग थे और असली सत्ता रीजेंट के हाथ में थी। ऐसा ही एक मामला हिमाचल या मध्य भारत की किसी छोटी रियासत से जोड़ा जाता है। मेनन और उनकी टीम ने राजकुमार के लिए एक टॉय ट्रेन सेट मंगवाया और साथ ही बेहतर सुविधाओं व भविष्य की गारंटी दी। इसके बाद कुछ ही दिनों में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर हो गए। हालांकि, यह किस्सा किसी औपचारिक सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं मिलता।
कश्मीर के महाराजा: सेना से मांगनी पड़ी मदद
जम्मू-कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह स्वतंत्र रहना चाहते थे और भारत तथा पाकिस्तान - दोनों से दूरी बनाए हुए थे। अक्टूबर 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावर कश्मीर में घुस आए। हालात बिगड़ने पर महाराजा ने भारत से सैन्य मदद मांगी। बदले में 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके बाद भारतीय सेना श्रीनगर पहुंची और कश्मीर भारत का हिस्सा बना।
भारत में विलय करने वाली आखिरी रियासत कौन सी थी?
भारत में विलय करने वाली आखिरी रियासत सिक्किम थी, जिसके शासक चोग्याल पाल्डेन थोंडुप नामग्याल थे। 1975 में वहां जनमत संग्रह कराया गया, जिसमें भारी बहुमत से भारत में शामिल होने के पक्ष में मतदान हुआ। इसके बाद सिक्किम आधिकारिक रूप से भारत का 22वां राज्य बना और भारत का नक्शा ऐतिहासिक रूप से पूर्ण हुआ।
भारत का नक्शा कब पूरा हुआ?
व्यावहारिक रूप से भारत का राजनीतिक नक्शा 26 जनवरी 1950 को पूरा माना जाता है, जब भारतीय संविधान लागू हुआ और अधिकांश रियासतें पूरी तरह भारतीय संघ में समाहित हो गईं। लेकिन ऐतिहासिक रूप से अंतिम अध्याय 1975 में सिक्किम के साथ पूरा हुआ।
स्रोत:
वी. पी. मेनन - भारतीय रियासतों के विलय की कहानी
रामचंद्र गुहा - स्वतंत्र भारत के बाद
लैरी कॉलिन्स और डोमिनिक लैपिएर - फ्रीडम एट मिडनाइट
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