राजस्थान में बदलते मौसम का असर अब रबी फसलों पर दिखने लगा है. ठंड और अधिक नमी के कारण गेहूं और जौ की फसल में पीली रोली रोग फैलने का खतरा बढ़ गया है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह रोग तेजी से पूरे खेत में फैल सकता है और पैदावार को नुकसान पहुंचा सकता है. किसानों को जल जमाव से बचाव, संतुलित उर्वरक उपयोग और नियमित निरीक्षण करने की सलाह दी गई है. समय पर दवा छिड़काव और जैविक उपाय अपनाकर इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है.
राजस्थान में मौसम लगातार बदल रहा है, कभी ठंड बढ़ रही है तो कभी नमी अधिक हो रही है. इस बदलाव का असर अब किसानों की रबी फसलों पर साफ दिखाई देने लगा है. किसानों के अनुसार, इस समय गेहूं और जौ की फसल में पीली रोली रोग तेजी से फैल सकता है. यह रोग खासतौर पर ठंड और अधिक नमी के कारण बढ़ता है, इसलिए किसानों को अभी से सावधानी बरतने की जरूरत है.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि पीली रोली रोग में गेहूं और जौ की पत्तियों की ऊपरी सतह पर पीले और नारंगी रंग की धारियां उभरने लगती हैं. कई बार ये धारियां फफोले जैसी दिखाई देती हैं. जब संक्रमित पत्तियों को हाथ लगाया जाता है तो उंगलियों और कपड़ों पर पीला पाउडर जैसा चूर्ण लग जाता है. शुरुआत में यह रोग खेत में केवल 10 से 15 पौधों पर एक गोल दायरे में दिखाई देता है, लेकिन धीरे-धीरे यह पूरे खेत में फैल सकता है.
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उन्होंने बताया कि इस, अभी खेत में बिल्कुल भी जल जमाव न होने दें, क्योंकि पानी रुकने से रोग का खतरा बढ़ जाता है. इसके साथ ही किसानों को नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों का अधिक प्रयोग करने से बचना चाहिए. इससे उर्वरक और कीटनाशक का उपयोग हमेशा विभागीय सिफारिश के अनुसार ही करें. क्योंकि अभी फसल पकाव का समय है. किसान की छोटी सी गलती उसकी पूरी फसल की खराब कर सकती है.
एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के अनुसार, फरवरी के महीनों में किसानों को अपनी फसल का नियमित निरीक्षण करते रहना चाहिए. यदि पीली रोली रोग की पुष्टि हो जाए तो नियंत्रण के लिए दवा छिड़काव करना है. किसान टेबुकोनाजोल 25.90 प्रतिशत ई.सी. या प्रोपिकोनाजोल 25 प्रतिशत ई.सी. नामक कवकनाशी दवा का 0.1 प्रतिशत घोल बनाकर छिड़काव करें. यानी एक लीटर पानी में एक मिलीलीटर दवा मिलाकर स्प्रे किया जा सकता है. आवश्यकता होने पर 15 दिन के अंतराल पर दूसरा छिड़काव भी किया जा सकता है.
इसके अलावा एग्रीकल्चर एक्सपर्ट ने यह भी बताया कि संक्रमित पौधों के समूह को अलग करके नष्ट कर देना चाहिए ताकि रोग आगे न फैले. यदि रोग का प्रकोप अधिक बढ़ जाए और आर्थिक नुकसान की संभावना हो, तो कृषि विभाग किसानों को अनुदान पर पौध संरक्षण रसायन उपलब्ध कराकर नियंत्रण में सहायता करेगा. इस समय किसानों के लिए जरूरी है कि वे सतर्क रहें, समय पर निरीक्षण करें और विभाग की सलाह के अनुसार उपचार अपनाएं.
इसके अलावा, पीली रोली रोग के जैविक नियंत्रण के लिए किसान रासायनिक दवाओं के साथ-साथ प्राकृतिक उपाय भी अपना सकते हैं. इसके लिए 5 प्रतिशत नीम की खली का घोल या 3 प्रतिशत नीम तेल में थोड़ा सा साबुन मिलाकर छिड़काव करना लाभकारी होता है. नीम में मौजूद प्राकृतिक तत्व फफूंद के प्रसार को रोकते हैं. इसके अलावा गोमूत्र और छाछ का 10 प्रतिशत घोल बनाकर 7–10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने से भी रोग की तीव्रता कम होती है. खेत में संतुलित जैविक खाद, जैसे वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग करें और फसल चक्र अपनाएं, इससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और पीली रोली रोग का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है.
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