गेहूं की फसल में बाली निकलने के बाद न करें ये गलती,हो सकता है भारी नुकसान

गेहूं की फसल में बाली निकलने के बाद न करें ये गलती,हो सकता है भारी नुकसान

 गेहूं की फसल में बाली निकलने का समय सबसे नाजुक माना जाता है. इस दौरान थोड़ी सी लापरवाही भारी नुकसान का कारण बन सकती है. तेज हवा में या अधिक पानी के साथ की गई सिंचाई से फसल जमीन पर गिर सकती है, जिसे ‘लॉजिंग’ कहा जाता है. इससे दानों का भराव रुक जाता है और उत्पादन में बड़ी गिरावट आती है. कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक इस अवस्था में संभलकर रहना चाहिए. इस खबर में जानिए कैसे आप सिंचाई के साथ ही इस समय सही खाद, रोगों से बचाव और तापमान प्रबंधन पर ध्यान देकर आपकी फसल बेहतरीन होगी साथ ही पैदावार पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

गेहूं की फसल में बाली निकलते समय पौधों का भार ऊपर की ओर बढ़ जाता है. इस अवस्था में अगर तेज हवा के दौरान सिंचाई की जाती है, तो फसल जमीन पर गिर सकती है जिसे तकनीकी भाषा में 'लॉजिंग' कहते हैं. फसल गिरने से दानों का विकास प्रभावित होता है और उत्पादन में भारी गिरावट आती है. इसलिए हमेशा शाम के समय या शांत मौसम में ही हल्की सिंचाई करें.

कृषि विज्ञान केंद्र नियामतपुर में तैनात कृषि एक्सपर्ट डॉ. एनपी गुप्ता बताते हैं कि गोभ की अवस्था गेहूं के लिए 'क्रिटिकल' होती है. इस समय पौधों को नमी की आवश्यकता होती है, लेकिन पानी का भराव नहीं होना चाहिए. किसानों को खेत में जाकर पहले मिट्टी की नमी जांच लेनी चाहिए. अगर मिट्टी का लडडू न बने, तभी सिंचाई करें. अधिक पानी से जड़ों को ऑक्सीजन नहीं मिल पाती, जिसकी वजह से फसल पीली पड़ सकती है.

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इस नाजुक समय में भारी सिंचाई करने के बजाय केवल उतनी ही सिंचाई करें जिससे मिट्टी में नमी बनी रहे. क्यारियों में पानी को घंटों तक खड़ा न रहने दें. जलभराव से पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती हैं और पीलापन आने लगता है. यदि संभव हो तो स्प्रिंकलर यानी फव्वारा विधि से सिंचाई करें, क्योंकि यह समान रूप से पानी देता है और फसल गिरने का डर नहीं रहता.

बाली निकलते समय पौधों को फास्फोरस और पोटाश की विशेष जरूरत होती है. इस समय 00:52:34 या 00:00:50 का स्प्रे करना दानों के वजन और चमक के लिए रामबाण है. किसान ध्यान रखें कि इस समय यूरिया का छिड़काव बिल्कुल न करें. यूरिया से वानस्पतिक ग्रोथ फिर से शुरू हो जाती है और तना कोमल होकर गिरने के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है, जिससे दानों का भराव प्रभावित होता है.

फरवरी के अंत और मार्च में अक्सर तापमान बढ़ जाता है, जो दानों को समय से पहले सुखा सकता है. हल्की सिंचाई खेत के तापमान को नियंत्रित रखती है और पौधों को 'हीट स्ट्रेस' से बचाती है. दुधिया अवस्था में नमी का होना जरूरी है ताकि दाना पिचके नहीं और पूरा आकार ले सके. उचित नमी दानों के बेहतर विकास और उच्च गुणवत्ता को बनाए रखती है.

सिंचाई के बाद खेत में बढ़ी हुई नमी के कारण चेपा और रतुआ जैसे रोगों के फैलने की संभावना बढ़ जाती है. किसान नियमित रूप से खेत का चक्कर लगाएं और पत्तों के निचले हिस्से की जांच करें. अगर पीले धब्बे या चिपचिपा पदार्थ दिखाई दे, तो तुरंत विशेषज्ञों की सलाह लेकर दवाओं का छिड़काव करें. रोगों का समय पर नियंत्रण दानों की गुणवत्ता और चमक को बरकरार रखें.

बाली निकलने के बाद जब दाने 'डफ स्टेज' यानी थोड़े सख्त होने लगें, तब अंतिम सिंचाई का विचार करें. बहुत देर से या दाना पकने के बाद सिंचाई करने से अनाज की रंगत खराब हो सकती है और 'ब्लैक पॉइंट' जैसी समस्या आ सकती है. अपनी मिट्टी के प्रकार और स्थानीय मौसम को देखते हुए ही अंतिम सिंचाई का निर्णय लें ताकि फसल कटाई के समय मिट्टी पूरी तरह सूख जाए.










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