नई दिल्ली : पाकिस्तान 1971 के बाद एक बार फिर टूटने के कगार पर है। बलूचिस्तान में हालात बेकाबू हैं। वहां उग्रवादी संगठनों और सुरक्षाबलों के बीच हिंसा आम हो गई है। इसका सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। हालांकि, मौजूदा उथल-पुथल की जड़ें इतिहास के उन फैसलों में हैं, जिन्हें आज भी लोग अन्याय मानते हैं।
पाकिस्तानी सरकार और सेना संग बलूचिस्तानी विद्रोह की घटना कोई पहली बार नहीं हो रही है, इससे पहले भी समय-समय पर विद्रोह हुआ है। आखिर अंग्रेजों समय स्वतंत्र रियासत कलात (मौजूदा बलूचिस्तान) का पाकिस्तान में विलय कैसे हुआ और कब-कब बलूचों ने विद्रोह किए? इन सवालों के जवाब यहां पढ़ें..
यह कहानी तब शुरू हुई, जब भारत पर अंग्रेजों का शासन था। उस वक्त कलात रियासत (मौजूदा बलूचिस्तान का बड़ा हिस्सा) नेपाल जैसी स्वतंत्र हैसियत रखती थी। न नेपाल पर अंग्रेजों का शासन था और न कलात पर। जबकि हैदराबाद, पटियाला समेत देश की अन्य रियासतें अंग्रेजों के बनाए नियमों के अनुसार ही चल रही थीं।
कलात रियासत पर मीर अहमद यार खान का शासन था। जब साल 1947 में जब भारत की आजादी और अंग्रेजों की वापसी तय हो गई थी, तब बलूच नेताओं ने भी पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की थी। मोहम्मद अली जिन्ना ने बलूच नेताओं की मांग का समर्थन भी किया था।
.. तो बलूचिस्तान होता अगल देश
4 अगस्त, 1947 को मोहम्मद अली जिन्ना, मीर अहमद यार खान और लार्ड माउंटबेटन मिले। इस मुलाकात में इस बात पर सहमति बनी कि भारत के आजाद होने के अगले ही दिन कलात भी एक स्वतंत्र राष्ट्र बन जाएगा। यह हुआ भी था। 15 अगस्त 1947 को भारत को पूर्ण आजादी मिली और अगले ही दिन कलात को आजाद मुल्क का दर्जा मिल गया था।
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फिर कलात रियासत का विलय पाकिस्तान में कैसे हुआ?
नया-नवेला देश कलात (मौजूदा बलूचिस्तान) अपनी खुद की शासन व्यवस्था बना रहा था। अभी आजादी मिले पांच महीने पूरे हुए ही थे और छठवां लगा था कि मोहम्मद अली जिन्ना कलात में सेना की ताकत दिखाना शुरू कर दिया। हालात ये हो गए कि 25 फरवरी, 1948 यानी सिर्फ 7 महीने 9वें दिन मीर अहमद यार खान को एलान करना पड़ा- बलूचिस्तान के विलय का एलान करना पड़ा।
तब से लेकर आज तक न उनके लिए सही नीतियां बनी और न उनको बराबरी के अधिकार मिले। यही ऐतिहासिक जख्म आज भी बलूचिस्तान में विद्रोह और आक्रोश की बड़ी वजह बना हुआ है।
पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत बलूचिस्तान
राज परिवार की लड़ाई से लेकर जन-आंदोलन तक..5 बार हुआ विद्रोह
बलूचिस्तान के पाकिस्तान में विलय से लेकर अब तक पांच बार विद्रोह हुआ। अगर साल 1948 की बात करें तो यह सिर्फ एक 'राज परिवार' की लड़ाई थी, लेकिन आज एक जन आंदोलन और सशस्त्र गुरिल्ला युद्ध में बदल चुकी है।
बगावत नंबर-1: भाई के खिलाफ मैदान में उतरे थे प्रिंस अब्दुल करीम खान
कलात के आखिरी शासक मीर अहमद यार खान ने दबाव में आकर पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके खिलाफ विद्रोह हुआ और इसकी कमान उनके भाई प्रिंस अब्दुल करीम खान ने संभाली।
फिर पाकिस्तानी सेना विद्रोहियों को मौत के घाट उतारना शुरू किया तो प्रिंस अब्दुल करीम खान को घर-परिवार छोड़कर अफगानिस्तान भागना पड़ा था। आखिर में करीम की गिरफ्तारी हुई और तब जाकर बगावत खत्म हुई।
बगावत नंबर-2: फांसी पर लटका दिए खान के बेटे और भतीजे
पाकिस्तान ने साल 1955 में 'वन यूनिट' नीति लागू की थी। इस नीति के तहत पश्चिमी पाकिस्तान के सभी प्रांतों को एक इकाई बना दिया गया। इसके पीछे मंशा पूर्वी पाकिस्तान के बराबर सत्ता संतुलन दिखाना था, लेकिन इस नीति ने बलूचिस्तान की पहचान और स्वायत्तता खत्म कर दी। बलूचों से उनके अधिकार छी लिए।
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इसके खिलाफ 1958-59 में नवाब नौरोज खान की अगुवाई में बगावत हुई, लेकिन बगावत भी फेल हो गई। दहशत पैदा करने के लिए पाकिस्तानी सेना ने खान के बेटों और भतीजों को फांसी दे दी गई थी। बगावत खत्म हो गई, लेकिन इससे बलोच लोगों में असंतोष और व्यापक हो गया।
बगावत नंबर-3: वन यूनिट नीति वापस ली गई
पाकिस्तानी सरकार ने बलूचिस्तान में नए सैन्य अड्डे बनाने और स्थानीय संसाधनों पर कब्जा जमाने की कोशिश की। 1963-69 में इसके खिलाफ विद्रोह पनपा, जिसकी कमान शेर मोहम्मद मरी ने संभाली। हालांकि, जनरल याह्या खान ने 'वन यूनिट' नीति वापस ली, जिससे वहां कुछ सालों के लिए संघर्ष रुक गया।
बगावत नंबर-4: ईरानी मदद से बलूचों पर की बमबारी
यह बात 1973 की है, जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो थे। बलूचिस्तान में अताउल्लाह मंगल के नेतृत्व वाली निर्वाचित सरकार थी, लेकिन जुल्फिकार अली भुट्टो निर्वाचित प्रांतीय सरकार को बर्खास्त कर दिया। इससे बलूचिस्तान की जनता में असंतोष फैला और लोग मरने-मारने को सड़कों पर उतर आए। तब पाकिस्तान ने ईरानी हेलीकॉप्टरों की मदद से बलूच उग्रवादियों पर भारी बमबारी की।
बगावत नंबर-5: भुट्टो के तख्तापलट के बाद विद्रोह थमा
इस विद्रोह की शुरुआत साल 2000 में बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के सक्रिय होने के साथ हुई थी। इस बगावत की अगुवाई पहले नवाब अकबर बुगती ने की। अब डॉ. अल्लाह नजर ने इसकी कमान संभाल रखी है। यह अब केवल कबीलाई सरदारों तक सीमित नहीं है, बल्कि युवा मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षाओं का आंदोलन बन गया है।
अब आप सोच रहे होंगे- बलूच शब्द कहां से आया?
एक मान्यता के अनुसार, फारसी में 'बलूच' का अर्थ मुर्गे की कलगी से जुड़ा है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में काइ खुसरू (585 ईसा पूर्व) की सेना में शामिल बलूच योद्धा कलगीदार टोपियां पहनते थे, जिससे उन्हें बलूच नाम से बुलाया जाने लगा। फारसी महाकाव्य शाहनामा में बलूचों का बहादुर जाति के तौर पर उल्लेख किया गया है।
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