बांग्लादेश इन दिनों एक नए दौर की दहलीज पर खड़ा है. याद कीजिए 2024 का वो उथल-पुथल वाला साल, जब छात्रों की अगुवाई में हुए प्रदर्शनों ने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका.हसीना 15 साल तक सत्ता में रहीं, लेकिन चुनावों में धांधली, नागरिक अधिकारों पर पाबंदी और विपक्ष को दबाने के आरोपों से जनता तंग आ चुकी थी.
वो प्रदर्शन इतने उग्र हो गए कि सैकड़ों लोग मारे गए, और आखिरकार हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी. अब 12 फरवरी 2026 को होने वाला चुनाव उस दौर के बाद का पहला बड़ा इम्तिहान है. ये सिर्फ सांसद चुनने का मामला नहीं, बल्कि देश की लोकतांत्रिक नींव को मजबूत करने का भी. नोबेल विजेता मुहम्मद यूनुस की अगुवाई वाली अंतरिम सरकार ने 18 महीने तक सत्ता संभाली, और अब वोटर तय करेंगे कि आगे क्या होगा.
12 फरवरी को बांग्लादेश में चुनाव
12 फरवरी 2026, बांग्लादेश की राजनीति में एक नया अध्याय लिखने जा रहा है. यह वही देश है, जहां 2024 में छात्रों के नेतृत्व में हुए बड़े आंदोलन ने 15 साल से सत्ता में रहीं प्रधानमंत्री शेख हसीना को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया था. अब करीब 18 महीने बाद, देश पहली बार आम चुनाव के जरिए नई सरकार चुनेगा. इस पूरे संक्रमण काल की कमान नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार ने संभाली. अब जनता के सामने सवाल साफ है. क्या बांग्लादेश दोबारा लोकतंत्र की पटरी पर लौट पाएगा? बांग्लादेश बनेगा इस्लामी राज या लोकतंत्र की सांस बचेगी? छात्र क्रांति से चुनाव के सफर तक की पूरी कहानी सिलसिलेवार समझते हैं.
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छात्र क्रांति: जहां से कहानी ने मोड़ लिया
2024 में आरक्षण, बेरोजगारी और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर छात्र सड़कों पर उतरे. शुरुआत शांतिपूर्ण थी, लेकिन सरकारी सख्ती ने हालात बिगाड़ दिए. पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की जान गई. यही वह मोड़ था, जब शेख हसीना की सत्ता की नींव हिल गई. हालात इतने बिगड़े कि उन्हें देश छोड़कर भारत जाना पड़ा. यह सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं था, बल्कि जनता के गुस्से का विस्फोट था.
अंतरिम सरकार और यूनुस का रोल
शेख हसीना के जाने के बाद देश को संभालने की जिम्मेदारी नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार को मिली. इस सरकार का मकसद था व्यवस्था को स्थिर करना और निष्पक्ष चुनाव कराना. 18 महीने का यह दौर राहत और निराशा दोनों लेकर आया. अर्थव्यवस्था कुछ हद तक संभली, लेकिन बड़े सुधार अधूरे रह गए.
कितने वोटर, कितना बड़ा दांव?
इस चुनाव में करीब 12 करोड़ 70 लाख मतदाता वोट डालेंगे. यह आंकड़ा बताता है कि फैसला सिर्फ नेताओं का नहीं, आम लोगों की उम्मीदों का है. खास बात यह भी है कि आम चुनाव के साथ संविधान सुधारों पर जनमत संग्रह कराया जा रहा है-जहां जनता को सिर्फ "YES" या "NO" कहना है.
मुख्य मुकाबला: लोकतंत्र बनाम इस्लामी राजनीति?
बीएनपी (Bangladesh Nationalist Party)
नेता: तारिक रहमान
एजेंडा: भ्रष्टाचार पर लगाम
महंगाई और बेरोजगारी से राहत
प्रधानमंत्री के कार्यकाल की सीमा
बीएनपी खुद को लोकतांत्रिक मूल्यों का विकल्प बता रही है और सर्वे में उसे हल्की बढ़त मिलती दिख रही है.
जमात-ए-इस्लामी और सहयोगी
चेहरा: डॉ. शफीकुर रहमान
दावा: साफ-सुथरी, नैतिक राजनीति
हसीना के दौर में प्रतिबंध झेल चुकी जमात अब मजबूती से लौट आई है. हालांकि महिलाओं और अल्पसंख्यकों को लेकर उसके रुख पर सवाल उठ रहे हैं.
शफीकुर रहमान: अचानक कैसे बने बड़ा नाम?
डॉ. शफीकुर रहमान पेशे से डॉक्टर हैं और 2020 से जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख हैं. 2025 में पार्टी पर से प्रतिबंध हटते ही उन्होंने देशभर में दौरे किए, राहत कार्य किए और खुद को भ्रष्टाचार विरोधी चेहरे के तौर पर पेश किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के बाद पैदा हुए नेतृत्व के खालीपन ने उन्हें उभरने का मौका दिया.
बांग्लादेश में आम वोटर क्या चाहता है?
ढाका की गलियों से लेकर गांवों तक एक ही बात सुनाई देती है
शांति और स्थिरता.
कोई दंगे नहीं चाहता
कोई खून-खराबा नहीं चाहता
लोगों को काम, रोटी और सुरक्षा चाहिए
एक बुजुर्ग दुकानदार का कहना है, "सरकार कोई भी बने, बस हालात 2024 जैसे न हों."
महिलाएं और अल्पसंख्यक क्यों डरे हुए हैं?
बांग्लादेश लंबे समय तक महिला प्रधानमंत्रियों के नेतृत्व में रहा, लेकिन इस चुनाव में महिला उम्मीदवार कम हैं. जमात के उभार से कई महिलाओं और अल्पसंख्यकों को डर है कि उनकी आज़ादी सीमित हो सकती है. युवती छात्रा वसीमा कहती हैं, "हमने आंदोलन में जान लगाई, लेकिन चुनाव में हमारी आवाज कमजोर दिख रही है."
चुनाव शेड्यूल एक नजर में
प्रचार शुरू: 22 जनवरी 2026
प्रचार खत्म: 10 फरवरी 2026
मतदान: 12 फरवरी 2026
वोटों की गिनती: 12 फरवरी, उसी दिन
नतीजा सिर्फ सरकार नहीं, भविष्य तय करेगा
12 फरवरी का फैसला बताएगा कि बांग्लादेश छात्र आंदोलन की ऊर्जा को लोकतांत्रिक मजबूती में बदल पाएगा या नहीं. यह चुनाव सत्ता की कुर्सी से कहीं बड़ा है-यह भरोसे, आज़ादी और दिशा का सवाल है.
चुनाव से आगे क्या दांव पर लगा है?
ये चुनाव सिर्फ सरकार बनाने का नहीं, बल्कि संस्थाओं में विश्वास बहाल करने का है. 12.8 करोड़ वोटरों में ज्यादातर युवा हैं, और ये तय करेगा कि प्रदर्शन से निकली क्रांति स्थिर लोकतंत्र में बदल पाएगी या नहीं. चुनावी शेड्यूल देखें तो कैंपेन 22 जनवरी से शुरू हुआ, 10 फरवरी को खत्म, और 12 फरवरी को वोटिंग. मतगणना उसी दिन शुरू होगी.कुल मिलाकर, ये चुनाव बांग्लादेश के लिए एक नई शुरुआत का मौका है. लेकिन सवाल ये है कि क्या पुरानी सियासी जड़ें फिर हावी होंगी, या युवा आवाजें जीतेंगी? वोटरों की उम्मीदें ऊंची हैं, और दुनिया की नजरें इस पर टिकी हैं.
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