सीबीआई जांच, एक आरोपी की कथित आत्महत्या, दूसरा जमानत पर बाहर… लेकिन नकाबपोश शख्स की पहचान अब तक रहस्य
परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद / छुरा :छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा नगर के युवा पत्रकार उमेश कुमार राजपूत की 23 जनवरी 2011 को उनके ही घर में गोली मारकर हुई हत्या आज 15 वर्ष बाद भी कई अनुत्तरित सवालों के साथ खड़ी है। सबसे बड़ा सवाल—आखिर वह “तीसरा व्यक्ति” कौन था, जिसने चैनल गेट पर आवाज देकर उमेश राजपूत को बाहर बुलाया और जिसके बाद गोली चली?
परिजनों की लंबी लड़ाई और हाईकोर्ट की दखल के बाद मामला सीबीआई को सौंपा गया। जांच एजेंसी ने शिव कुमार वैष्णव और उनके बेटे को आरोपी बनाया। रिमांड के दौरान शिव कुमार वैष्णव की कथित आत्महत्या हो गई, जबकि उनके बेटे को जमानत मिल चुकी है। लेकिन घटना के समय मौजूद तथ्यों और चश्मदीद के बयान आज भी कई रहस्यों की ओर इशारा करते हैं।
घटना की शाम क्या हुआ था?
घटना के समय शिव कुमार वैष्णव उमेश राजपूत के साथ उनके कमरे में बैठे थे। वहीं उनका बेटा घर के अन्य सदस्यों के साथ मौजूद था।घर में काम करने वाली लड़की के अनुसार, अचानक चैनल गेट से किसी ने आवाज दी। जब वह बाहर गई तो देखा कि एक व्यक्ति के चेहरे पर कपड़ा बंधा था और उसके हाथ में गोल कागज के बंडल जैसा कुछ था। उसने पूछा—“उमेश राजपूत हैं क्या?”
काम करने वाली लड़की ने अंदर जाकर उमेश को बताया। जैसे ही उमेश राजपूत बैठक से निकलकर चैनल गेट के कपड़े के पर्दे के पास पहुंचे, “धांय” की आवाज आई। उमेश “अरे बाप रे” कहते हुए अंदर की ओर भागे और दरवाजा बंद किया।जब परिवार के लोग कमरे में पहुंचे तो उमेश राजपूत खून से लथपथ दरवाजे के पास गिरे पड़े थे। उन्हें तत्काल छुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
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शुरुआती जांच में क्या सामने आया?
पुलिस की प्रारंभिक जांच में दावा किया गया कि गोली बाहर से चलाई गई थी, क्योंकि चैनल गेट पर लगा कपड़े का पर्दा जलकर जगह-जगह छेद हो गया था। डॉक्टरों के अनुसार, उमेश राजपूत के शरीर में लगभग 94 छर्रे लगे थे, जो शॉटगन जैसे हथियार के उपयोग की ओर संकेत करते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—
यदि गोली बाहर से चली, तो वह नकाबपोश व्यक्ति कौन था?
और यदि वह तीसरा व्यक्ति था, तो उसकी पहचान अब तक क्यों नहीं हो सकी?
सीबीआई जांच और नए मोड़
मामला हाईकोर्ट के निर्देश पर सीबीआई को सौंपा गया। जांच एजेंसी ने शिव कुमार वैष्णव और उनके पुत्र को आरोपी बनाया।
रिमांड के दौरान शिव कुमार वैष्णव की कथित आत्महत्या ने पूरे मामले को और उलझा दिया। उनके पुत्र को बाद में जमानत मिल गई।
हालांकि, सीबीआई अब तक उस तीसरे व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक नहीं कर पाई है, जिसका जिक्र चश्मदीद ने किया था।
15 साल बाद भी अनुत्तरित सवाल
नकाबपोश व्यक्ति कौन था?
क्या वह पेशेवर शूटर था या किसी साजिश का हिस्सा?
क्या जांच एजेंसियों ने उस दिशा में पर्याप्त प्रयास किए?
शिव कुमार वैष्णव की कथित आत्महत्या के पीछे क्या परिस्थितियां थीं?
क्या असली साजिशकर्ता आज भी कानून की पकड़ से बाहर है?
परिवार और समाज की मांग-
परिजन आज भी न्याय की उम्मीद लगाए बैठे हैं। स्थानीय पत्रकार संगठनों और नागरिकों का कहना है कि यह मामला सिर्फ एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि पत्रकारिता की सुरक्षा और कानून व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा प्रश्न है।
15 वर्षों बाद भी जब “तीसरे व्यक्ति” का राज नहीं खुल पाया है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि—
क्या सच कभी सामने आएगा?
(यह मामला वर्तमान में सीबीआई कोर्ट में लंबित है। अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा किया जाना शेष है।)
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