शिवरात्रि सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि शिव और शक्ति के उस 'महामिलन' का उत्सव है, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देती है। यह वह पावन रात्रि है जब भक्त अपने आराध्य की कृपा पाने के लिए शिव मंदिरों की ओर खिंचे चले आते हैं, लेकिन उज्जैन की पवित्र भूमि पर, जहां कालों के काल महाकाल विराजते हैं, वहां इस पर्व की छटा ही निराली होती है।
यूं तो महाकाल के दरबार में भस्म आरती से लेकर शयन आरती तक, रोजाना छह बार भोलेनाथ का अद्भुत श्रृंगार होता है। मगर महाशिवरात्रि के ठीक बाद का दृश्य अकल्पनीय होता है। इस दिन वैराग्य धारण करने वाले भोलेनाथ एक मनमोहक दूल्हे के रूप में दर्शन देते हैं। सिर पर सेहरा और चेहरे पर तेज लिए, बाबा महाकाल का यह 'सेहरा श्रृंगार' भक्तों को भावविभोर कर देता है। आइए, आज हम उज्जैन की इसी दुर्लभ और कम सुनी परंपरा के दर्शन करते हैं।
बेहद खास है सप्तधान्य श्रृंगार
उज्जैन के महाकाल मंदिर में पुजारी आकाश शर्मा और सेवक भावेश वशिष्ठ ने बताया कि उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व बहुत धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन इस उत्सव का सबसे विशेष और अनोखा पहलू शिवरात्रि के अगले दिन देखने को मिलता है। यह वह समय होता है जब भगवान महाकाल एक दूल्हे के रूप में सजते हैं और भक्त उनके इस दिव्य स्वरूप के दर्शन करते हैं।
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बाबा महाकाल सेहरा दर्शन
महाशिवरात्रि के अगले दिन तड़के सुबह, भगवान शिव को दूल्हे की तरह सजाया जाता है। इस श्रृंगार को 'सेहरा दर्शन' कहा जाता है। परंपरा के अनुसार, भगवान को एक विशाल सेहरा (पुष्प मुकुट) पहनाया जाता है। यह सेहरा सिर्फ फूलों से नहीं बनता, बल्कि इसमें भारी मात्रा में फूलों के साथ-साथ 'सप्तधान' का इस्तेमाल भी किया जाता है। साथ ही भगवान को एक सुंदर मुखौटा भी पहनाया जाता है, जो शिव-पार्वती विवाह की खुशी और उत्साह का प्रतीक है।
सप्तधान का महत्व
इस श्रृंगार की सबसे बड़ी खासियत 'सप्तधान' है। सप्तधान का मतलब है सात प्रकार के अनाज का इस्तेमाल। भगवान के सेहरे में जिन सात अनाजों का उपयोग किया जाता है, जिनमें चावल, खड़ा मूंग, तिल, मसूर, गेहूं, जौ, खड़ा उड़द शामिल हैं।
इन अनाजों को शुभ माना जाता है और यह प्रकृति द्वारा दिए गए उपहारों का प्रतीक हैं। यह श्रृंगार साल में सिर्फ एक बार होता है और इसलिए इसका महत्व बहुत ज्यादा है।
समृद्धि का प्रतीक
श्रृंगार उतरने के बाद, जो आरती होती है उसे 'सेहरा आरती' कहा जाता है। जब यह रस्म पूरी हो जाती है और भगवान का सेहरा उतारा जाता है, तो उसमें उपयोग किए गए सप्तधान (अनाज) को एक विशेष प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। मान्यता है कि यह अनाज बहुत चमत्कारी होता है। इस प्रसाद का कुछ हिस्सा सरकारी खजाने में ही रखा जाता है, ताकि राज्य में धन की कमी न हो।
बाकी बचा हुआ अनाज भक्तों में बांट दिया जाता है। श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि अगर इस अनाज को घर की तिजोरी या धन रखने के स्थान पर रखा जाए, तो घर में कभी भी धन-धान्य की कमी नहीं होती और घर में सुख, शांति और 'बरकत' (समृद्धि) लाता है।
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