रंगभरी एकादशी के दिन तुलसी से जुड़ी इन बातों का रखें ध्यान,वरना मां लक्ष्मी होंगी नाराज

रंगभरी एकादशी के दिन तुलसी से जुड़ी इन बातों का रखें ध्यान,वरना मां लक्ष्मी होंगी नाराज

 वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रंगभरी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करने से साधक को जीवन में सभी सुख मिलते हैं और संकटों से मुक्ति मिलती है।

इस दिन तुलसी पूजा का भी विशेष महत्व है, लेकिन तुलसी से जुड़े नियम का पालन जरूर करना चाहिए। इससे मां लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं। इस बार रंगभरी एकादशी 27 फरवरी को मनाई जाएगी। आइए आपको बताते हैं कि रंगभरी एकादशी के दिन तुलसी से जुड़ी कौन-सी गलतियों करने से बचना चाहिए।

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तुलसी पूजा के नियम

  1. धार्मिक मान्यता के अनुसार, तुलसी माता एकादशी के दिन भगवान विष्णु के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। इसलिए एकादशी के दिन भूलकर भी तुलसी में जल न दें। ऐसा माना जाता है कि तुलसी में जल देने से माता तुलसी का व्रत टूट सकता है।
  2. तुलसी के पत्ते न तोड़ें। इससे मां तुलसी नाराज हो सकती हैं। भगवान विष्णु के भोग में तुलसी के पत्ते शामिल करने के लिए दशमी तिथि पर तुलसी के पत्ते तोड़ कर रख लें।
  3. इसके अलावा एकादशी के दिन तुलसी को स्पर्श करने से बचना चाहिए। इससे मां तुलसी का व्रत टूट सकता है। पूजा के दौरान मां तुलसी को दूर से ही प्रणाम करें।
  4. धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां लक्ष्मी का वास साफ-सफाई वाली जगह पर होता है। इसलिए पौधे के पास साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें। तुलसी के पास जूते-चप्पल, झाड़ू न रखें।

रंगभरी एकादशी 2026 डेट और शुभ मुहूर्त 

वैदिक पंचांग के अनुसार, फाल्गुन में रंगभरी एकादशी 27 फरवरी को मनाई जाएगी।
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरुआत- 27 फरवरी को देर रात 12 बजकर 33 मिनट पर
फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का समापन- 27 फरवरी को रात 10 बजकर 32 मिनट पर होगा

तुलसी स्तुति मंत्र -


देवी त्वं निर्मिता पूर्वमर्चितासि मुनीश्वरैः

नमो नमस्ते तुलसी पापं हर हरिप्रिये।।

तुलसी श्रीर्महालक्ष्मीर्विद्याविद्या यशस्विनी।

धर्म्या धर्मानना देवी देवीदेवमन: प्रिया।।

लभते सुतरां भक्तिमन्ते विष्णुपदं लभेत्।

तुलसी भूर्महालक्ष्मी: पद्मिनी श्रीर्हरप्रिया।।

तुलसी गायत्री -

ॐ तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो वृन्दा प्रचोदयात् ।।










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