मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है 

मुखिया के मुखारी - पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है 

पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में अनवरत घोटालों का दौर चला ,भाजपा सरकार में जाँच का दौर चल रहा ,पर आंच किसी पर नही आ रही है, अखिल भारतीय सेवा संवर्ग के अधिकारी हो या राज्य संवर्ग के अधिकारी कर्मचारी किसी के खिलाफ कानून के हाथ लंबे साबित नही हो पा रहें, कानून छुटभैये नेताओं को छोड़ दे रहा तो फिर माननीय नेताओं के मान का ज्ञान तो उसे होगा ही, लगता है एक अधिकारी और एक व्यापारी ने मिलकर पूरा गिरोह बना छ.ग. में संगठित लुट कर ली, घोटालों पे घोटालों को अंजाम दे डाला ,क्या बिना राजनीतिक संरक्षण के इन घोटालों को अंजाम दिया गया ? या फिर राजनीतिक आकाओं के आगे सरकार शक्तिहीन और कानून बेबस हो जाती है?  संगीन अपराधों के अपराधी खुले में घूम रहें ,बेखौफ राजनीति कर रहें, अधिकारी कुर्सियों पर विराजमान है ,मंत्रालय से लेकर जमींन तक शोभायमान है, कार्यवाही पर कार्यवाही पर परिणाम सिफर हैं ,जाँच में घिरी छ.ग. की पुलिस जाँच ऐसी कर रही की सब जमानत के हकदार हैं, न पुलिस अभियोजन को अपराध की गंभीरता समझा पा रही, न अभियोजन का साक्ष्य न्यायालयों में टिक पा रहा, करोड़ो अरबों के घोटालों में जमानत हो जा रही छ.ग. आर्थिक अपराधों का कटोरा बन गया है,धान ही नहीं , धन धान्य से परिपूर्ण हो गई, अधिकारी नेता रोज ईठला रहे ,इतरा रहे,पूर्व मुख्य सचिव रेरा अध्यक्ष नजूल की जमींन पर स्वामित्व से अरबों निपटा रहें।

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पुलिस अधिकारी सट्टे से पैसा कमा जमीनों में खपा रहें, नेताओं का यत्र -तत्र सर्वत्र बेनामी निवेश हैं, फिर भी सरकार कहतीं है छ.ग. प्रगति पथ पर अग्रसर है भ्रष्टाचारी सारे फल फुल रहे वट  वृक्ष बन चौक -चौक पर खड़े,घोटालों की जाँच चल रही पर क्या इन घोटालों के राज कभी खुलेंगे, जो गिरफ्तार हुए क्या सही में कानून की गिरफ्त में आएंगे ?न्याय क्या कभी उन्हें दंडित करेगा या फिर जमानत के दम पर वों दंभ भरेंगे ?घोटालों की लंबी फेहरिस्त उससे बड़ी आरोपियों की सूची पर सजा उनमें से किसी एक को नहीं ,तारीख पे तारीख मिल रहे टकटकी लगाएं जनता न्याय की चाल देख रही ,पूर्व मंत्री जेल से सदन में पहुंच गए माननीय विधायकों से मिल रहे, जो खुद हैं कानून के गिरफ्त में वों अब कानून बनायेंगे ,जिन्हें छत्तीसगढ़ से है बाहर रहना वों विधानसभा भवन में कथन पे कथन देंगे, गवाही नहीं प्रभावित करेंगे ये चाल है या चलन पर जमानत की शर्तें यही है,ऐसी शर्तें माननीयों के मान के अनुरूप हैं ,अधिकारी ऐसे माननीयों के आगे अपने मान को गिरवी रखने मजबूर है, कुछ को पैसों के लिए सबकुछ मंजूर है भ्रष्टाचार की दौड़ती सरपट गाड़ी के ये दो बैल हैं जो फंदे एक लकड़ी से जिनकी डोर आका के हाथ में है ,राजनीतिक सुचिता को तिलांजली दे रिश्ते निभाए जा रहे।

पंचवर्षीय कार्यकाल में पीढ़ियों के लिए धन जुटाए जा रहें, अधिकारी नेता कदाचरण को भी सदाचरण बता रहें, बिना हाजमोला खाएं अरबों डकार जा रहें ACB ,EOW ,ED ,IT के छापों की छाप न्यायालयों तक छप नही पा रही छप तो गए बहुंत पर छपने के बाद भी कोई ठोस कार्यवाही नही हो पा रही ,भ्रष्टाचार में आरोपित कोई अधिकारी क्या ईमानदारी से काम करेगा ? मौका मिले तो दूसरी बार भ्रष्टाचार नही करेगा?  रही सही कसर सरकार खुद पूरा कर दे रहे उन्हें मलाईदार पदों पर बिठाकर उनकी ऊँची उड़ान को पंख दे रही ,भ्रष्टाचार से मिले सामर्थ्य  से अखिल भारतीय सेवा संवर्ग के द्वार खुल रहें, भ्रष्ट अधिकारियों को भी IAS अवार्ड हो रहे, बिना PSC दिलाए डिप्टी कलेक्टर बनें सज्जन अब IAS होने वाले हैं ,GAD की गलती है या फिर केन्द्रीय कार्मिक विभाग सोया हुआ है, क्या कोई अनुकम्पा नियुक्ति के सहारे IAS बन सकता है ? ये नियमो की अनदेखी है या नया नियम अनदेखा है?  PSC  के परीक्षा परिणाम पर दशकों से उच्चतम न्यायालय में केस लंबित है, लगता है वों अधिकारी सेवा निवृत्त हो जाएंगे पर मसला निवृत्त नहीं होगा? अधिकारियों और सरकारों की जुगलबंदी हर मानक से परे है जिसने पैसों की उगाही ली एकमात्र लक्ष्य है इन परिस्थितियों में न्याय का रोज पराभाव हो रहा, समझौतों की जकड़न में ईमानदारी है, अकड़ पूरी बईमानी की जारी है ,नैतिकता दूर की कौड़ी हैं क्योंकि ---------------------------------------------पैसा सबसे ज्यादा जरुरी है 

चोखेलाल

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मुखिया के मुखारी व्यवस्था पर चोट करती चोखेलाल की टिप्पणी








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