परमेश्वर राजपूत, गरियाबंद (छुरा):छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले के छुरा नगर के 32 वर्षीय युवा पत्रकार उमेश राजपूत की सनसनीखेज हत्या के 15 वर्ष बाद भी न्याय की डगर अधूरी नजर आ रही है। 2 मार्च को रायपुर स्थित विशेष सीबीआई कोर्ट में मामले की अंतिम सुनवाई हुई, लेकिन अब तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हो पाना कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। परिजनों का आरोप है कि न तो स्थानीय पुलिस और न ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) इस बहुचर्चित हत्याकांड की गुत्थी सुलझा पाई है।
घर में घुसकर मारी गई थी गोली
23 जनवरी 2011 को छुरा नगर में पत्रकार उमेश राजपूत की उनके ही निवास पर गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। घटना के समय घर में पांच लोग मौजूद थे। बताया जाता है कि एक व्यक्ति ने घर के दरवाजे पर आकर पूछा, “क्या उमेश राजपूत हैं?” जैसे ही उमेश गेट की ओर बढ़े, उन पर फायरिंग कर दी गई। घर में काम करने वाली युवती के कथन अनुसार, परिजनों ने बताया कि उस संदिग्ध व्यक्ति का केस डायरी में उल्लेख तक नहीं किया गया।
चार साल स्थानीय जांच, फिर CBI को सौंपा गया मामला
हत्या के बाद लगभग चार वर्षों तक स्थानीय पुलिस ने जांच की, लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हो सकी। इसके बाद परिजनों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सीबीआई जांच की मांग की। वर्ष 2015 के आसपास मामला सीबीआई को सौंपा गया, जो तब से अब तक लंबित रहा।
साक्ष्यों से छेड़छाड़ के गंभीर आरोप
परिजनों ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि: कुछ प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए
घटनास्थल पर मिला धमकी भरा पर्चा पुलिस थाने में बदल दिया गया और केस डायरी में डुप्लीकेट दस्तावेज संलग्न किया गया।
फायरिंग से प्रभावित कपड़े का पर्दा, उमेश का मोबाइल और कंप्यूटर की हार्ड डिस्क स्थानीय थाने से गायब हो गए।
इन महत्वपूर्ण साक्ष्यों के गायब होने पर अब तक किसी जिम्मेदार अधिकारी पर ठोस कानूनी कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई।
ब्रेन मैपिंग रिपोर्ट में प्रभावशाली लोगों का जिक्र
शुरुआती जांच के दौरान पुलिस ने कुछ संदेहियों से पूछताछ कर अहमदाबाद में ब्रेन मैपिंग टेस्ट कराया था। रिपोर्ट में कथित तौर पर संकेत मिले थे कि हत्या सुपारी देकर कराई गई और इसमें कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका हो सकती है। यहां तक कि एक राजनीतिक दल से जुड़े पूर्व विधायक के बेटों से जुड़े लोगों का नाम सामने आने की बात भी रिपोर्ट में कही गई थी। परिजनों का आरोप है कि इस दिशा में सूक्ष्म जांच नहीं की गई।
CBI ने बदली जांच की दिशा
सीबीआई ने पूर्व जांच रिपोर्ट को दरकिनार करते हुए नए सिरे से जांच शुरू की। इसी दौरान एक पत्रकार को हिरासत में लिया गया, जिसकी सीबीआई रिमांड के दौरान कथित आत्महत्या का मामला भी विवादों में रहा। इस घटना ने जांच की पारदर्शिता पर और प्रश्नचिह्न लगा दिए।
“क्या CBI पिंजरे का तोता बन गई है?”
मामले की धीमी प्रगति और आरोपियों की गिरफ्तारी न होने से परिजन आक्रोशित हैं। उनका कहना है कि जांच एजेंसियों ने कई अहम पहलुओं को नजरअंदाज किया और प्रभावशाली लोगों को बचाने के लिए मामले को लंबित रखा। 15 साल बाद भी किसी आरोपी का न पकड़ा जाना न्याय व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी
विशेष सीबीआई कोर्ट, रायपुर में 2 मार्च को हुई अंतिम सुनवाई के बाद परिजन अब सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि जब तक सच्चाई सामने नहीं आती और दोषियों को सजा नहीं मिलती, तब तक वे न्याय की लड़ाई जारी रखेंगे।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या उच्चतम न्यायालय इस बहुचर्चित हत्याकांड में नई दिशा देगा और एक बार फिर पुनः नये सिरे से जांच शुरू की जाएगी और वर्षों से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे परिजनों को राहत मिलेगी या नहीं। आने वाले दिन इस मामले की दिशा तय करेंगे।
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